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मेरे पिता : सरिता भाटिया

मेरे पिता एवं भाई 


माँ ने जो बेशुमार प्यार दिया,

पिता ने चुपचाप दुलार किया !

ऊँगली पकड़ जो चलना सिखाया,

तुतलाते बोलों ने अर्थ आपसे पाया !

पिता की डांट में छुपा था प्यार ,

जिसका न हो पाया कभी इजहार !

अन्दर से नरम और ऊपर से कठोर ,

अकेले बैठ हमेशा ही हुए भावविभोर !

बेटे बेटी का न कभी किया अंतर ,

चलते ही रहे बिना थके आप निरंतर !

माँ के माथे की बिंदिया का थे विश्वास ,

साथ हमेशा होने का दिलाया अहसास !  

जब था अनजान सब दुनिया का नजारा ,

पिता के कन्धों पर बैठ देखा जग सारा !

जिंदगी के सफ़र का जब आपने विश्राम पाया ,

हमने कन्धों पर आपको मोक्षद्वार पहुँचाया  !  

पिता की छांव ने सिखाया खिलखिलाना ,

'सरिता' निरंतर बहना न व्यर्थ आँसू बहाना !!

.........................................

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 711

Comment

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Comment by Sumit Naithani on June 15, 2013 at 9:18am

सरिता जी ....बहुत सुंदर रचना ............बधाई स्वीकार करेँ

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 8:44am

आ0 सरिता जी,  अतिसुन्दर रचना, बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Abid ali mansoori on June 15, 2013 at 8:40am
रचना मेँ भावपूर्ण चित्रण के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करेँ आदरणीया!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 15, 2013 at 7:48am
आदरणीया..सरिता जी, अपनी पंक्तियो मे सच कहा आपने.."माँ के माथे की बिंदिया का थे विश्वास, साथ हमेशा होने का दिलाया अहसास...जब था अनजान सब दुनिया का नजारा, पिता के कन्धों पर बैठ देखा जग सारा!...अति सुंदर भावपूर्ण पंक्तियां, आदरणीया..शुभकामनाऐं स्वीकार करें

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