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रूठकर गयी थी सुबह मुझसे 

रात का दर्पण दिखा कर 
फिर लौट आयी है सुबह !!.
.
रूठकर गयी थी बहार मुझसे 
पतझड के पत्ते उड़ा कर 
फिर लौट आयी है फिजा !!
.
रूठकर जो गये तुम मुझसे 
न आये लौट के.....लौट के आयी
मन का अज़ाब और यादें नाचार !!
.
.
अज़ाब =पीड़ा,  नाचार =असहाय
 
सुमित नैथानी 
मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 3:19pm

Saurabh Ji@ अभी नादाँ हूँ ..सीखते सीखते वक्त लगेगा 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2013 at 2:58pm

यदि मुझसे निवेदित है यह पंक्ति ..आगे से इस बात का पूरा ध्यान रखा जायेगा .. तो इस तरह का निवेदन किसी लिहाज से कोई उचित तरीका नहीं. 

दूसरे, मैं प्रथम नाम से संबोधनों को आदर देता हूँ.

सादर

Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 2:03pm

पाण्डेय जी@ आगे से इस बात का पूरा ध्यान रखा जायेगा 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2013 at 11:35am

विशेष भाव दशा की रचना के लिए अतिशय बधाइयाँ. लिखते रहें सुमित भाई.

एक बात:

रचना के साथ उसी रचना का जेपीइजी फ़ाइल ? कुछ समझ में नहीं आया. रचना के गठन और उसके शिल्पगत विन्दुओं पर संकेन्द्रित रहा जाय तो रचना के प्रस्तुतिकण और उसकी संप्रेषणीयता में सुधार होता जायेगा.

शुभेच्छाएँ

Comment by Sumit Naithani on July 2, 2013 at 10:30am

बाजपाई जी शुक्रिया 

Comment by Sumit Naithani on July 2, 2013 at 10:30am

 Ladiwala जी शुक्रिया 

Comment by Sumit Naithani on July 2, 2013 at 10:29am

उप्रेती जी शुक्रिया 

Comment by annapurna bajpai on July 1, 2013 at 2:09pm

बहुत सुंदर प्रस्तुति भावपूर्ण अभिव्यक्ति । बहुत बधाई आपको सुमित जी ।   

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2013 at 8:56pm

सुन्दर प्रस्तुति के लिय बधाई 

Comment by Harish Upreti "Karan" on June 30, 2013 at 4:00pm

रूठकर जो गये तुम मुझसे.....न आये लौटकर सुन्दर मर्मस्पर्शी........

कृपया ध्यान दे...

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