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ग़ज़ल लिखने का प्रयास

तसव्वुर जिसका देखा मैंने, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो॥
रात पूनम, महताब जैसी, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो॥

ऐसी ज़ुल्फ़ की छांव जैसे, घटा हों काली बादल की,
छांव में जिसकी मिलता सुकून, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो॥

तेरी चंचल, शोख़ अदाएँ, चाल जैसे मृगनयनी सी,
देख पवन जिसे रुक न पाए, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो॥

कद काठी काया अनमोल, हुश्न-ए-नूर जैसे ख़ुदा की,
सूरज जैसे निकले सहर में, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो॥

हुश्न की मल्लिका तुम्हें शुक्रिया, ज़िन्दगी में आने का,
जन्नत ज़मीं पे मिली 'अभी' को, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो॥

"मौलिक व अप्रकाशित"
छाया चित्र : गूगल

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Comment

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Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 11, 2013 at 10:26am
आदरणीय डॉ प्राची जी और आदरणीय भाई साहब केसरी जी,
सादर आभार, हौसला अफ़जाई के लिए।

जी, आप सबने ठीक कहा है, मैं अब ग़ज़ल के लिंक्स का अध्यन कर रहा हूँ।

सादर आभार

Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 1:41am

सुन्दर प्रयास है अभिषेक जी
ग़ज़ल के आधार तत्वों में से रदीफ़ को आपने खूब अच्छे से निभाया है इसके लिए बधाई स्वीकारें ...

अन्य तत्वों को निभाने में चूक हुई है इस पर पुनः गौर करें तो निः संदेह अच्छी ग़ज़ल हो सकती है 
शुभकामनाएं


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 10, 2013 at 10:57pm

बहुत कोमल भाव और सुन्दर प्रस्तुति आ० अभिषेक जी 

पर यह रचना गज़ल नहीं है...

हर पेज को स्क्रॉल करके सबसे नीचे जाइए वहाँ गज़ल सीखने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण लिंक्स दिए हुए हैं, उन्हें पढ़िए और गज़ल प्रयास कीजिये 

शुभकामनाएं 

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 10, 2013 at 6:40pm

आदरणीय सौरभ सर,

एक नज़र इसपे भी डालियेगा, क्या ये सही है ?


इश्क़ में जीत और हार, नहीं होता।
ये इबादत, जाय़ा य़ार, नहीं होता।

काम में ईमानदारी, बर्ती जाए, तो,
कोई काम नाक़ाम य़ार, नहीं होता।

एहतियात के साथ आगे बढ़ता चल,
कोई भी दौर कठिन य़ार, नहीं होता।

ओह! वो अपने को इंसां कहता है !
सियासत में इंसां य़ार, नहीं होता।

'अभी' कहता है, कोई भी बात दिल से,
मान कहना, नुकसाँ य़ार, नहीं होता।
________-अभिषेक कुमार झा ''अभी''

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 10, 2013 at 6:35pm
आदरणीय सौरभ सर,
क्षमा प्रार्थी हूँ, आगे से इस तरह की प्रस्तुत नहीं करूँगा।
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 10, 2013 at 6:15pm

ग़ज़ल पर आपके प्रयास के प्रति शुभकामनाएँ.

आप इस प्रस्तुति के पूर्व इसी मंच पर उपलब्ध ग़ज़ल से सम्बन्धित साहित्य पढ़ लेते तो ग़ज़ल की विधा के मूल विन्दु आपको स्पष्ट हो जाते. फिर आपसे वो गलतियाँ न होतीं जो आपकी इस प्रस्तुति को ग़ज़ल होने से ही ख़ारिज़ कर देती हैं.

यह अवश्य है भाई, कि आपकी कोशिश ही आने वाले समय में आपकी रचनाओं को स्वीकार्य और पठनीय बनायेगी. 

शुभेच्छाएँ

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