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ग़ज़ल : रखना ख्याल

रखना ख़याल शह्र का मौसम बदल न जाय
जुल्मत कहीं चराग़ की लौ को निगल न जाय

आमादा तो है नस्लकुशी पर अमीरे शह्र
डरता भी है कि उसका पसीना उबल न जाय

अजदाद से मिला जो असासा बचाके रख
मुट्ठी में सुखी रेत की तरह फ़िसल न जाय

तस्वीर तेरी देखकर कुछ ग़मज़दा हूँ मैं
इक दिन तेरे शबाब का सूरज ये ढल न जाय

हरगिज न आप जाइये साहिल के आस पास
डर है शवाए हुस्न से दरिया उबल न जाय

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by vijayashree on September 1, 2013 at 12:11am

सुंदर ग़ज़ल 

रखना ख़याल शह्र का मौसम बदल न जाय
जुल्मत कहीं चराग़ की लौ को निगल न जाय

 

बधाई स्वीकारें  सुशील ठाकुरजी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 31, 2013 at 8:23pm

हरगिज न आप जाइये साहिल के आस पास
डर है शवाए हुस्न से दरिया उबल न जाय...इस बेहतरीन ग़ज़ल के इस अति बेहतरीन दिलकश शेर के लिए ढेरों बधाई आदरनीय सुशील जी ..एक निवेदन उर्दू के शब्दों का मतलब भी अगर नीचे दे देंगे तो समझने में सहजता होगी ..सादर नमन के साथ 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 31, 2013 at 5:09pm

तस्वीर तेरी देखकर कुछ ग़मज़दा हूँ मैं
इक दिन तेरे शबाब का सूरज ये ढल न जाय.........यह शेर बहुत पसंदीदा हुआ

सुंदर गजल पर दाद कुबूल कीजिये आदरणीय शुशील जी

Comment by Shyam Narain Verma on August 31, 2013 at 12:52pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by annapurna bajpai on August 31, 2013 at 11:07am

रखना ख़याल शह्र का मौसम बदल न जाय
जुल्मत कहीं चराग़ की लौ को निगल न जाय .............  बहुत खूबसूरत अशआर , बहुत बधाई आपको  आदरणीय  ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 31, 2013 at 10:53am

सुशील भाई , अच्छी गज़ल हुई , बहुत बहुत बधाई !!

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