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नये साल का गीत: कुछ ऐसा हो साल नया -- संजीव 'सलिल'

नये साल का गीत

कुछ ऐसा हो साल नया

संजीव 'सलिल'

*

कुछ ऐसा हो साल नया,

जैसा अब तक नहीं हुआ.

अमराई में मैना संग

झूमे-गाये फाग सुआ...

*

बम्बुलिया की छेड़े तान.

रात-रातभर जाग किसान.

कोई खेत न उजड़ा हो-

सूना मिले न कोई मचान.

प्यासा खुसरो रहे नहीं

गैल-गैल में मिले कुआ...

*

पनघट पर पैंजनी बजे,

बीर दिखे, भौजाई लजे.

चौपालों पर झाँझ बजा-

दास कबीरा राम भजे.

तजें सियासत राम-रहीम

देख न देखें कोई खुआ...

स्वर्ग करे भू का गुणगान.

मनुज देव से अधिक महान.

रसनिधि पा रसलीन 'सलिल'

हो अपना यह हिंदुस्तान.

हर दिल हो रसखान रहे

हरेक हाथ में मालपुआ...

 

*****

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Comment

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Comment by Shriprakash shukla on January 1, 2011 at 7:22pm
मंगल कामनाओं से परिप्लावित अति सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बढ़ाई स्वीकार करें 
सादर 
श्रीप्रकाश शुक्ल  

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