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रात की चांदनी मैं जो तू बे-नकाब हो जाए 
खुदा  का चाँद  भी फिर लाजबाव हो जाए 

.

तेरे गुलाबी होंठों पे जो गिर जाए शबनम 
बा-खुदा शबनम खुद शराब हो जाए 

.
तेरी उदासी से होती है सीने मैं चुभन 
तू जो हंस दे तो काँटा गुलाब हो जाए 

.

उम्र भर हाथों मैं लेकर पढता ही रहूँ 
तेरा चेहरा गर  कोई किताब हो जाए 

.
हुस्नवाले संवर सकती है शायरी मेरी 
कभी हमराह मेरे जो तेरा शबाब हो जाए  

 

-सचिन देव -
मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by vijay nikore on September 25, 2013 at 7:49pm

 

बहुत ही खूबसूरत गज़ल है। बधाई आदरणीय सचिन जी।

 

//तेरी उदासी से होती है सीने मैं चुभन 
तू जो हंस दे तो काँटा गुलाब हो जाए //

सादर,

विजय निकोर

Comment by Meena Pathak on September 25, 2013 at 6:59pm

उम्र भर हाथों मैं लेकर पढता ही रहूँ
तेरा चेहरा गर कोई किताब हो जाए
.... गज़ब

बहुत बधाई आप को आ० सचिन जी

Comment by Sachin Dev on September 25, 2013 at 4:33pm

आपका हार्दिक आभार विजयाश्री जी...... आपके बहुमूल्य प्रोत्साहन के लिए !

Comment by vijayashree on September 25, 2013 at 3:38pm

रात की चांदनी मैं जो तू बे-नकाब हो जाए 

खुदा  का चाँद  भी फिर लाजबाव हो जाए    ........ बहुत खूब

उम्र भर हाथों मैं लेकर पढता ही रहूँ 
तेरा चेहरा गर  कोई किताब हो जाए ..........वाह 

हार्दिक बधाई सचिन जी 

 

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 25, 2013 at 3:15pm

स्वागत है भाई सदैव ह्रदय से स्वागत है शुभकामनाएं सचिन साथ ही साथ अगली बहर में ग़ज़ल की प्रतीक्षा के साथ.

Comment by Sachin Dev on September 25, 2013 at 3:13pm

बहुत - बहुत शुक्रिया अरुण भाई.... निश्चित ही आपकी सलाह पर अमल करने का भरसक प्रयास रहेगा.... और आपका साथ सदा ही अपेक्षित है ..... ! एक बार फिर से हार्दिक आभार आपका ! 

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 25, 2013 at 3:07pm

सचिन भाई आभार आपका, आपने कल मुझे फेसबुक पर ये कहा आपने एक टूटी फूटी ग़ज़ल ओ बी ओ पर पोस्ट की है मैं अपने विचार रखूं भाई इस वजह से मैंने आपसे प्रश्न किया. भाई जहाँ तक मन से निकले भाव की बात है तो भाव सदा अच्छे ही होते हैं आपने प्रयास भी बहुत अच्छा किया है आप इसे ग़ज़ल का रूप दे सकते हैं यदि थोडा सा श्रम करें. मैं आपको यही कहूँगा कि भाई इस मंच से तमाम मित्रों ने ग़ज़ल सीखी है और सीख रहे हैं आप भी पाठशाला में जाकर ग़ज़ल सीख सकते हैं. बाकी मैं आपके साथ हूँ. इस प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

Comment by Sachin Dev on September 25, 2013 at 2:54pm

आपका हार्दिक शुक्रिया चंद्रशेखर पाण्डेय जी ... जो आपने गजल की भावना को मान दिया ! 

Comment by Sachin Dev on September 25, 2013 at 2:53pm

शुक्रिया भाई बैधनाथ जी ... प्रोत्साहन के लिए 

Comment by Sachin Dev on September 25, 2013 at 2:51pm

नमस्कार भाई अरुण जी, सबसे पहले तो आपका हार्दिक शुक्रिया पोस्ट पर नजर डालने के लिए.... जैसा कि आपने प्रश्न किया है कि मैं गजल की बहर से अवगत कराऊं तब आप इस पर कुछ कह सकेंगे... इस पर इतना ही कहना चाहूँगा भाई कि आप जिसे गजल कह रहे हैं, उसे मैं सिर्फ अपने मन से निकली एक रचना कहता हूँ.. गजल विधा या अन्य किसी भी साहित्यिक विधा की तकनीकी अनभिज्ञता के कारण मैं आपके प्रश्न का उत्तर देने मैं बिलकुल भी समर्थ नही हूँ ..... इस बारे मैं यही कहूँगा जो पहले भी कई रचनाकार कह चुके होंगे कि मैं सिर्फ मन के भाव को ही शब्द देने की कोशिश करता हूँ... और इस रचना मैं भी मैंने यही किया है .... मेरी इस तकनीकी अनभिज्ञता की वजह से यदि आप इस रचना पर कुछ भी कह पाने मैं खुद को असहज महसूस करते हैं तो ... आप बाध्य नहीं है अरुण भाई... और यदि मेरी इस तकनीकी कमी के बारे मैं मुझे कुछ कहना चाहें तो आप स्वतंत्र हैं ... आपके विचारों का स्वागत है ... 

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