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कैकई के मोह को

पुष्ट करता

मंथरा की

कुटिल चाटुकारिता का पोषण

 

आसक्ति में कमजोर होते दशरथ

फिर विवश हैं

मर्यादा के निर्वासन को

 

बल के दंभ में आतुर

ताड़का नष्ट करती है

जीवन-तप  

सुरसा निगलना चाहती है

श्रम-साधना

एक बार फिर

 

धन-शक्ति के मद में चूर

रावण के सिर बढ़ते ही जा रहे हैं 

 

आसुरी प्रवृत्तियाँ

प्रजननशील हैं

 

समय हतप्रभ

धर्म ठगा सा आज है फिर

 

राम ! तुम कहाँ हो ?

‌‌‌‌‌‌‌‌‍=====================

--बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by बृजेश नीरज on October 13, 2013 at 6:04pm

आदरणीय अरुण जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 13, 2013 at 6:03pm

आदरणीय आशुतोष जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 13, 2013 at 5:09pm

आदरणीय बृजेश भाई वाह अत्यंत संवेदनशील प्रस्तुति, राम ! तुम कहाँ हो ? भाई जी मेरा ह्रदय भी कई कई बार यही गुहार लगाता है. गहन भाव भरी पंक्तियाँ ह्रदय स्पर्श कर गई, क्षुब्ध ह्रदय से निकली सुन्दर रचना हेतु दिल से बधाई स्वीकारें.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 13, 2013 at 4:41pm

आदरणीय नीरज जी ..दशहरे के इस पर्व पर सबसे पह्हले आपको ढेरो बधाईयों एवं इस सुंदर रचन पर हार्दिक बधाई के साथ 

Comment by बृजेश नीरज on October 13, 2013 at 1:28pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 13, 2013 at 10:56am

आसुरी प्रवृत्तियाँ

प्रजननशील हैं

 

समय हतप्रभ

धर्म ठगा सा आज है फिर

 

राम ! तुम कहाँ हो ?

बेहद गहन, सदा की तरह, बहुत प्रभावशाली रचना, बहुत बहुत बधाई आदरणीय बृजेश जी

Comment by बृजेश नीरज on October 11, 2013 at 10:38pm

आदरणीय केवल भाई जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 11, 2013 at 8:29pm

........क्या कहने? वाह....बहुत सुन्दर कविता।    हार्दिक बधार्इ स्वीकारें। आदरणीय बृजेश  भार्इजी,  सादर,

Comment by बृजेश नीरज on October 11, 2013 at 7:26pm

आदरणीय अभिनव जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 11, 2013 at 7:26pm

आदरणीय अमन जी आपका हार्दिक आभार!

अपनी समझ भर ही लिख सका इसे! यदि आप कुछ मार्गदर्शन दें तो शायद मेरा प्रयास आपके लिए संतुष्टिकारक बन सके!

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