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में रोज जब घर से निकलता हूँ

तो खुला आसमान दिखता है

जैसे कि वो अपनी अनन्तता में

मेरा स्वागत कर रहा हो,

 

हवाएं मेरे बालों को सहलाती,

पंछी गीत गाते मुझे सुकून देते हैं

जमीन मेरा बोझ उठाकर

मुझे सम्हाले रखती है,

 

ये इनका रोज का नियम है ,

उनका प्रेम है जो, कभी कम नहीं होता

शायद वो अपना धर्म नहीं जानते ,

वरना मुझे छोड़ आपस में ही

वाद विवाद में उलझे होते,

 

या फिर शायद वो अपना धर्म

इतना जानते हैं के उनको

फुर्सत नहीं

अपने धर्म का पालन करने से..

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Comment

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Comment by Bhasker Agrawal on April 25, 2011 at 10:08am
धन्यवाद विवेक जी
Comment by विवेक मिश्र on January 14, 2011 at 5:35pm

sundar prastuti. badhai ho bhasker ji.

Comment by Bhasker Agrawal on January 14, 2011 at 3:01pm

धन्यवाद गणेश जी और अनुपमा जी

में एडमिन जी का भी धन्यवाद करना चाहूँगा जिन्होंने इस रचना को एक बहतर रूप दिया

Comment by anupama shrivastava[anu shri] on January 14, 2011 at 12:58pm
bahut khoob likha hai.ये इनका रोज का नियम है ,

उनका प्रेम है जो, कभी कम नहीं होता
badhiyan...........bhaskar ji.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 14, 2011 at 11:08am
शायद वो अपना धर्म

इतना जानते हैं के उनको

फुर्सत नहीं

अपने धर्म का पालन करने से..

 

बहुत बढ़िया रचना , सन्देशपरक कृति, बेहतरीन प्रस्तुति, धन्यवाद भाष्कर भाई |

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