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ये कैसी दीवाली ? अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

दिया है

शरीर

कर्मों की

अग्नि  

मन की बाती

सांसों का

तेल

सारा जीवन

परम पिता का

खेल !!!!!

घर की

जमीन

लीपी गई

दीवारें

पोती गई

सब कुछ

साफ साफ

लाइटों का

जगमग उजाला

बाहरी दिया भी

जला डाला !!!!!!!

अन्दर अँधेरा

दिया शांत

बाती शीतांग

कर्म विरोधी

दुर्दांत

चुकता तेल

अपने ईश्वर से

असंभव मेल

आत्मा से दूर

हर हाथ सवाली

नीयत काली

ये कैसी दीवाली ? !!!!!!

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment by गिरिराज भंडारी on November 2, 2013 at 6:17pm

आदरणीय रवि प्रभाकर भाई , परम संत श्री शेख फरीद बाबा जी को मेरा श्रद्धा नमन !!!! आदरणीय मै उनके नाखून के बराबर भी नही हूँ !!!! मेरी बातों मे  कहीं उनकी बातों की झलक आपको मिली , मै धन्य हुआ !!!!! आपको बहुत बहुत शुक्रिया !!!! ऐसे ही स्नेह बनाये रखें !!!!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 2, 2013 at 10:46am

सच! कहा आपने आदरणीय, मन के अंदर अगर दीवाली की जगमग रोशनी में भी, अमावस्या का अंधकार हो तो कैसी दीपावली, त्यौहार अपनों के साथ स्वतंत्र होकर खुशी खुशी मनाये जाते है, बंधनों से नहीं..आपको बहुत बहुत बधाई आदरणीय गिरिराज जी

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 1, 2013 at 7:37pm

अंदर बाहर सब रौशन हो तब होगी सच्ची दीवाली । बधाई छोटे भाई ।

Comment by Ravi Prabhakar on November 1, 2013 at 7:21pm

आदरणीय भंडारी जी,
सादर प्रणाम। आपकी रचना दिल को छू गई। बहुत ही श्रेष्ठ रचना है, मुझे इसमें
बाबा शेख फरीद जी की रचनाओं जैसी पावन सुगन्ध महसूस हुई। दिल से
शुभकामनाएं।

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