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हाकिम निवाले देंगे

गाँव-नगर में हुई मुनादी

हाकिम आज निवाले देंगे

 

सूख गयी आशा की खेती

घर-आँगन अँधियारा बोती

छप्पर से भी फूस झर रहा

द्वार खड़ी कुतिया है रोती

 

जिन आँखों की ज्योति गई है

उनको आज दियाले देंगे

 

सर्द हवाएँ देह खँगालें

तपन सूर्य की माँस जारती

गुदड़ी में लिपटी रातें भी

इस मन को बस आह बाँटती

 

आस भरे पसरे हाथों को 

मस्जिद और शिवाले देंगे

 

चूल्हे हैं अब राख झाड़ते

बासन भी सब चमक रहे हैं

हरियाई सी एक लता है

फूल कहीं पर महक रहे हैं

 

मासूमों को पता नहीं है

वादे और हवाले देंगे

 

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित) 

Views: 448

Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on November 30, 2013 at 11:37am
भावनाओं से ओतप्रोत रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.... 
Comment by बृजेश नीरज on November 30, 2013 at 11:36am

आदरणीय गोपाल जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 11:18am

प्रिय ब्रजेश जी

कुंठा की इस सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए 

शब्द नही मिल पा रहे

हाकिम आज निवाले देंगे से लेकर वादे  और हवाले देंगे तक

झकझोरती कविता  i दियाले देंगे एक  मार्मिक शब्द प्रयोग i

सब कुछ बेहतर i  मेरी शुभकामनाये i

 

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