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पुष्प समान समझ कर

पुष्प समान समझ कर तुमको,
    सुगंध तुम्हारी बन जायेंगे.
जग में खो दिया जो तुमको,
   शायद कुछ न फिर पाएंगे.
मस्त हवा सा चलना तेरा,
   अपलक मुझको देखना तेरा.
तेरे हस्त को न छू पाए,
   क्या फिर कुछ हम छू पाएंगे.
ये जीवन है इक कठपुतली,
  चलना इसका हाथ में तेरे.
तुमने हाथ जो नहीं हिलाए,
   कैसे फिर हम चल  पाएंगे.
नहीं जानते तेरे मन को,
  क्या देखा है तुमने सपना.
तेरा फिर भी पूर्ण स्वप्न हो,
   ऐसी कामना कर जायेंगे.

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Comment by shikha kaushik on January 24, 2011 at 1:04pm
सार्थक प्रस्तुति.बधाई .

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 24, 2011 at 9:10am
ये जीवन है इक कठपुतली,
  चलना इसका हाथ में तेरे.
तुमने हाथ जो नहीं हिलाए,
   कैसे फिर हम चल  पाएंगे..............वाह वाह , श्रृंगार रस से सरावोर यह कविता अच्छी लगी | आपसे उम्मीद है कि आगे भी आपकी रचनायें तथा अन्य लेखको कि रचनाओं पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ प्राप्त होती रहेगी |

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