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सफ़र को हसीं - सा इक मोड़ दीजिए ,
मंजिलें दो दिलों की जोड़ दीजिए |
 
ऐ खुदा ! करने ग़ैरों की भलाई ,
दुनियावालों में कभी होड़ दीजिए |  
 
भरे जो कड़वाहट कभी यूँ दिल में ,
धोकर इसे प्यार से निचोड़ दीजिए |
 
कब तक हमें बाँटोगे सरहदों में ,
मिटाकर लकीरें अब जोड़ दीजिए |
 
मिटाने गरीबी जो सच्ची हो मंशा ,
रखे परदेस में गुल्लक फोड़ दीजिए |
 
क्या हुआ जो सौ में बस दस ही मिली ,
बन किंगमेकर एक गठजोड़ दीजिए |
 
हिम्मत की आग में मेहनत तपाकर ,
तकदीर की लकीरें मोड़ दीजिए |
 
जकड़े कदम बेड़ियाँ जो बनकर ,
रुढियों को ऐसी तोड़ दीजिए |
 
निकल आएंगे राम अंदर से उसके ,
रावण को इक दफा झंझोड़ दीजिए |
 
करे जो कोई चोट अपने वतन पे ,
तो दुश्मन को जवाब मुंह-तोड़ दीजिए |

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Comment

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Comment by Veerendra Jain on February 2, 2011 at 12:44pm

Ganesh ji...bahut bahut aabhar aapka... apna aashirwad dene ke liye...

Kshma chahta hoon ...Ganeshji... per main to dhundh dhundh kar  sabhi mitro ki rachnayen padhkar un per comments dene ka ek bhi mauka nai chhodta hoon... kyunki protsahan tonik ka kaam karta hai..ye mujse behtar koi nahin jaan sakta... Dhanyawad...


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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 30, 2011 at 12:41pm
अच्छा प्रयास है वीरेंदर जी, ख्यालात अच्छे है , उम्मीद करते है कि ऐसे ही आपकी और कृतियाँ पढने को मिलेगी, अन्य रचनाकारों की रचनाओं पर भी अपना विचार व्यक्त करे साथ ही १ फरवरी से ३ फरवरी तक चलने वाले महा इवेंट मे अपनी सहभागिता सुनिच्चित करे |

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