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जो गुज़र गया वो गुज़र गया ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

11212  11212  11212   11212

 

उसे भूल जा तू न  याद कर, जो गुज़र गया वो गुज़र गया

जिसे तख़्ते दिल में बिठाया था,वो उतर गया तो उतर गया

 

यहाँ आंधियों का वो ज़ोर है ,कि  उजड़ गया है मेरा चमन 

मेरी चाहतें मिली ख़ाक में , मेरा ख़्वाब था जो बिखर गया

 

सुनो हाकिमों मुझे दो सजा , है गुनाह मुझको क़ुबूल सब

मेरा यार मेरा गवाह था , मुझे ग़म है वो ही मुकर  गया

 

ये जो बारिशें हुई अश्क की , ये कहीं से बात भली भी है

तेरा ग़म पिघल के जो बह गया, तेरा अक़्स भी है निखर गया 

 

तेरा हर सितम है अजीबतर , मेरा हौसला भी अज़ीमतर

मुझे उस तरफ से उजाड़ा जब, तो मै इस तरफ से सँवर गया

************************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 13, 2014 at 4:08pm

आदरणाय अरुण अनंत भाई , गज़ल की सराहना कर मेरा उत्साह वर्धन करने के लिये आपका तहेदिल से आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 13, 2014 at 4:06pm

आ दरणीय बृजेश भाई , गज़ल को आपकी सराहना मिली , मेरा ग़ज़ल कहना सार्थक हुआ , आपका बहुत बहुत आभार ॥

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 13, 2014 at 1:01pm

सुनो हाकिमों मुझे दो सजा , है गुनाह मुझको क़ुबूल सब

मेरा यार मेरा गवाह था , मुझे ग़म है वो ही मुकर  गया

ये जो बारिशें हुई अश्क की , ये कहीं से बात भली भी है

तेरा ग़म पिघल के जो बह गया, तेरा अक़्स भी है निखर गया ......कमाल की ग़ज़ल ..आदरनीय गिरिराज भाईसाब इतनी लम्बी बहर के इस शानदार ग़ज़ल के लिए तहे दिल बधाई ...सादर बधाई के साथ 

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 13, 2014 at 11:02am

वाह वाह आदरणीय गिरिराज सर क्या कहने लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने सभी अशआर अच्छे लगे खासकर इन दो अशआरों पर विशेष दाद कुबूल फरमाए.

सुनो हाकिमों मुझे दो सजा , है गुनाह मुझको क़ुबूल सब

मेरा यार मेरा गवाह था , मुझे ग़म है वो ही मुकर  गया ... गज़ब गज़ब

तेरा हर सितम है अजीबतर , मेरा हौसला भी अज़ीमतर

तू ने उस तरफ से उजाड़ा जब, तो मै इस तरफ से सँवर गया. वाह वाह वाह

Comment by बृजेश नीरज on January 12, 2014 at 10:53pm

वाह! बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 12, 2014 at 7:58am

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , गज़ल को आपका आशीर्वाद मिला , बहुत खुशी हुई , आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 12, 2014 at 7:57am

आदरणीय अभिनव भाई , गज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया बहुत उत्साह  वर्र्धन कर रही है , सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 12, 2014 at 7:55am

आदरनीय बड़े भाई अखिलेश जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by vijay nikore on January 12, 2014 at 7:37am

बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर। बधाई, मेरे भाई।

 

Comment by Abhinav Arun on January 11, 2014 at 3:00pm

सुनो हाकिमों मुझे दो सजा , है गुनाह मुझको क़ुबूल सब

मेरा यार मेरा गवाह था , मुझे ग़म है वो ही मुकर  गया

.......आदरणीय श्री गिरिराज जी हर शेर नायाब----- ग़ज़ल जैसे नगीना हुई है रोशन रोशन कलाम----बहुत मुबारबाद आपको !!

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