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जाने कब तक (नवगीत)

जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
साँस के तार 
जब तक जुड़े है 
देह की ये 
पतंगे उड़े है 
 
है महज-
उँगलियों का इशारा   … 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
हमने देखा है 
अपना रवैया 
काम हो तो 
करें दादा-भैया 
 
ढंग जायज़ 
नहीं ये हमारा    .... 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
ये व्यवस्था का 
जोड़ो-घटाना 
गुणा -भाग का 
है तराना  
 
इसके आगे 
नहीं कोई चारा   .... 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
कर्म अच्छे 
अगर हम करेंगे 
बाद अपने भी 
जिन्दा रहेंगे 
 
रखें  पाक  
सत्संग की धारा 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
.
(अप्रकाशित-मौलिक रचना )
अविनाश बागड़े 

Views: 728

Comment

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Comment by AVINASH S BAGDE on January 9, 2014 at 10:16pm

Meena Pathak ji

आपकी हौसला अफ़ज़ाई से अभिभूत हूँ 

Comment by shashi purwar on January 9, 2014 at 10:06pm

sundar bhav , sundar rachna badhai aapko ,

Comment by S. C. Brahmachari on January 9, 2014 at 8:36pm
जाने कबतक चले खेल सारा ? ~~~~~ आपकी रचना मे जीवन का दर्शन छुपा है ... हार्दिक बधाई आपको ! बरबस मुझे ये गीत याद आ रहा है ~~~ इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल , जग मे रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल .... कोई निशानी छोड फिर दुनियाँ से डोल ............
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 9, 2014 at 8:17pm
कर्म अच्छे 
अगर हम करेंगे 
बाद अपने भी 
जिन्दा रहेंगे ................बहुत सुंदर सार्थक सन्देश
बधाई स्वीकारें आदरणीय अविनाश जी
Comment by annapurna bajpai on January 9, 2014 at 7:08pm

आ0 अविनाश जी सुंदर नवगीत हेतु बधाई स्वीकारें ।  

Comment by Meena Pathak on January 9, 2014 at 6:42pm
कर्म अच्छे 
अगर हम करेंगे 
बाद अपने भी 
जिन्दा रहेंगे 
 
रखें  पाक  
सत्संग की धारा 
जाने कब तक 
चले खेल सारा .............. बहुत सुन्दर नवगीत .. बधाई आप को | सादर 

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