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अन्दर की चिंगारी को खोजो

मैं
समुद्र की उन लहरों की तरह नहीं
जो बार -बार गिरती है / उठती है
और
किनारे तक आते - आते
दम तोड़ देती है ॥

मैं
उन घोड़ो की तरह भी नहीं
जिसे
चश्मा लगा देने पर
सुखी घास भी
हरी दूब समझ खा लेते हैं ॥


मैं
उन दिहाड़ी मजदूरों की तरह भी नहीं
जो १०० रुपया और एक पेट खाना पर
बुला लिए जाते है ....
राजनेताओ की रैलियो में
भीड़ जुटाने के लिए ॥

मैं तो चिंगारी हु मेरे दोस्त !!
सबके दिल में रहता हु
ओस की एक बूंद .......
मेरी इहलीला समाप्त कर सकती है
या
हवा की तनिक सी सिहरन
मुझे अंगारे बना सकती है ॥

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Comment by Rash Bihari Ravi on June 3, 2010 at 2:54pm
हवा की तनिक सी सिहरन
मुझे अंगारे बना सकती है ॥
bah kya bat hain,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 1, 2010 at 11:53pm
वाह बहुत ही उम्द्दा ये रचना है, जबरदस्त, क्या सोच है, बहुत ही बढ़िया कविता , धन्यबाद के पात्र है बबन भाई, जै हो,
Comment by baban pandey on June 1, 2010 at 1:56pm
कंचन जी ,आनद वत्स जी ....आप लोगों का स्नेह और प्यार ही किसी को लिखने के लिए प्रेरित करता है ...कोई खास विषय वस्तु पर लिखना कठिन होता है ...फिर भी ...अगर आप मुझे कोई टोपिक देगे तो मैं उस पर लिखने की कोसिस अवश्य करुगा ....मैं हु एक नया सदस्य ....बबन पाण्डेय
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on June 1, 2010 at 1:56pm
मैं
समुद्र की उन लहरों की तरह नहीं
जो बार -बार गिरती है / उठती है
और
किनारे तक आते - आते
दम तोड़ देती है ॥

bahut hi badhiya rachna hai baban bhaiya.......
Comment by Kanchan Pandey on June 1, 2010 at 1:47pm
मैं
समुद्र की उन लहरों की तरह नहीं
जो बार -बार गिरती है / उठती है
और
किनारे तक आते - आते
दम तोड़ देती है ॥
Bahut hi shandar vichar hai, harek bharat vaasi key andar aisi hi chingaari ki jaroorat hai, jo samay aaney par angaar mey badal jaay.
Comment by Admin on June 1, 2010 at 1:23pm
मैं तो चिंगारी हु मेरे दोस्त !!
सबके दिल में रहता हु
ओस की एक बूंद .......
मेरी इहलीला समाप्त कर सकती है
या
हवा की तनिक सी सिहरन
मुझे अंगारे बना सकती है ॥

आदरणीय बबन पाण्डेय जी प्रणाम, और बहुत बहुत स्वागत है ओपन बुक्स ऑनलाइन पर आपके पहले ब्लॉग का, आपने तो अपने पहले ही ब्लॉग मे एक ऐसा चिंगारी छोड़ दिया है की उसका अंगारा बनना तय है, बहुत ही उम्द्दा और ससक्त अभिव्यक्ति है ,आदरणीय योगराज जी तो पहले ही आप के बारे मे मुझे बताया था आज मै आपकी प्रतिभा को देख भी लिया हू, मै तहे दिल से योगराज प्रभाकर जी का शुक्रगुजार हू जो उन्होने ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार मे एक और हीरा जोड़ने मे सहायक बने,

आपका अपना ही
ADMIN
OBO
Comment by Anand Vats on June 1, 2010 at 1:08pm
मैं आपका कायल हु | शानदार और वाकई में उम्दा सोच बहुत बहुत वधाई

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