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नवगीत--(उदासी गर्इ भौंरा फिर गुनगुनाया)

हॅसी रूप कलियों का जब मुस्कुराया,
उदासी गर्इ भौंरा फिर गुनगुनाया।।

बहारों की रानी,

राजनीति पुरानी।
नर्इ-नर्इ कहानी,

जवानी-दीवानी।
महगार्इ बढ़ाकर,

नववधू घर आती।
दिशाएं भी छलती,

गरीबी की थाती।
अमीरों का राजा, अल्ला-राम आया।। 1

सजाते हैं संसद,

समां बर्रा छत्ता।
परागों को जन से,

चुराती है सत्ता।
अगर रोग-दु:ख में,

पुकारे भी जनता।
शहर को जलाकर,

कमाते हैं भत्ता।
चुनावों का सस्ता गल्ला शाम आया।। 2

तरसती है शिक्षा,

बिलखती है दीक्षा।
चलन से छले न्याय,

सत, करती प्रतीक्षा।
चिकित्सा की मर्जी,

अनिशिचत है भिक्षा।
उधारी में लटके,

किसानों की इच्छा।
नहीं बिजली-पानी, हल्ला काम आया।। 3

के0पी0 सत्यम मौलिक व अप्रकाशित


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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 4, 2014 at 7:44pm

आदरणीया कुन्ती मुखर्जी, सरिता जी व मीना जी,  सादर प्रणाम!  आप लोगों के उत्साहवर्धन एवं सराहना हेतु आप सभी का हार्दिक आभार। सादर,

Comment by Meena Pathak on February 4, 2014 at 6:35pm

बहुत बहुत बधाई सुन्दर नवगीत हेतु ..सादर 

Comment by Sarita Bhatia on February 4, 2014 at 4:53pm

हार्दिक बधाई भाई जी 

Comment by coontee mukerji on February 4, 2014 at 3:02am

भाई केवल जी इतनी सुंदर नवगीत केलिये आपको बहुत बहुत बधाई.बहुत सफ़ल प्रयास है. सादर

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