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जो मुस्का दो खिल जाये मन

जो मुस्का दो खिल जाये मन 

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खिला खिला सा चेहरा  तेरा

जैसे लाल गुलाब

मादक गंध जकड़ मन लेती

जन्नत है आफताब

बल खाती कटि सांप लोटता

हिय! सागर-उन्माद

डूबूं अगर तो पाऊँ मोती

खतरे हैं बेहिसाब

नैन कंटीले भंवर बड़ी है

गहरी झील अथाह

कौन पार पाया मायावी

फंसे मोह के पाश

जुल्फ घनेरे खो जाता मै

बदहवाश वियावान

थाम लो दामन मुझे बचा लो

होके जरा मेहरबान

नैन मिले तो चमके बिजली

बुत आ जाए प्राण

जो मुस्का दो खिल जाए मन

मरू में आये जान

गुल-गुलशन हरियाली आये

चमन में आये बहार

प्रेम में शक्ति अति प्रियतम हे!

जाने सारा जहान

--------------------

"मौलिक व अप्रकाशित"

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

२०.०२.२०१४

४.३०-५ मध्याह्न

करतारपुर जालंधर पंजाब

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Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 24, 2014 at 9:00pm

प्रिय डॉ मिश्र जी रचना की प्रस्तुति नारी के प्रति प्रेम और सौंदर्य ने आप के मन को प्रभावित किया प्रोत्साहन के लिए  आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 24, 2014 at 8:58pm

प्रिय जितेन्द्र जी रचना के भाव आप को प्यारे लगे लिखना सार्थक रहा आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 24, 2014 at 8:44pm

आदरणीय  गिरिराज  भाई रचना  आप  के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी
 आभार
भ्रमर ५

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 24, 2014 at 11:35am

बेहद सुदर रचना ..नारी के सौंदर्य को समाहित किये हुए इस बिशेस गीत के लिए तहे दिल धन्यवाद .सादर  

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 23, 2014 at 8:40am

बेहद सुंदर भावपूर्ण रचना, हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय सुरेन्द्र जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 22, 2014 at 8:58pm

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , सुन्दर भाव अभिव्यक्ति के लिये आपको बहुत बधाइयाँ ॥

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