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होली की विरह कविता (ओमप्रकाश क्षत्रिय ''प्रकाश'')

मन तरसे

------------------------
तन तरसे मन तरसे .
होली का रंग बरसे .

मै हो गई प्रेम दीवानी
मुझे देख मधुकर हरषे .


फूल गई सब कालिया
मै सुखी निकली घर से .

कोयल कूके पपीहा गाए
भटकी मै बावरी घर से .

लगी हुई विरह वेदना
इलाज नहीं होता हर से .

मेरे प्रियत्तम आ जाओ

मिटे वेदना उस पल से .
=============

मौलिक व अप्रकाशित"
ओमप्रकाश क्षत्रिय ''प्रकाश''

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Comment

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Comment by Omprakash Kshatriya on March 16, 2014 at 7:41am

खयालों में नहीं , हकीकत में खेलो .

मन में खुशिया निर्मलता  ले लो .

.................... होली है .

Comment by Omprakash Kshatriya on March 14, 2014 at 7:18am

प्रियतम क्या प्रिया क्या अब सभी रंगने को आतुर हैं
चलो हम भी बोले होली है तुम भी बोलो होली है .

मदन मोहन सक्सेना,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, आप सभी को भी होली की हार्दिक शुभकामना .

Comment by Omprakash Kshatriya on March 14, 2014 at 7:17am

laxman  प्रसाद ladiwala जी आप ने प्रतिक्रिया दे कर मेरा उत्साह वर्धन किया इस के लिए आभार  

Comment by Madan Mohan saxena on March 13, 2014 at 4:59pm
होली की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाऐ .

ना शिकबा अब रहे कोई , ना ही दुश्मनी पनपे
गले अब मिल भी जाओं सब, आयी आज होली है

प्रियतम क्या प्रिया क्या अब सभी रंगने को आतुर हैं
चलो हम भी बोले होली है तुम भी बोलो होली है .

मदन मोहन सक्सेना
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 12, 2014 at 7:39pm

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय जी 

Comment by Omprakash Kshatriya on March 12, 2014 at 7:15am

गत २ दिनों में ४२ रचनाकारों ने रचना देखी . यह अच्छी बात है . सभी का आभार .

Comment by Omprakash Kshatriya on March 11, 2014 at 8:31pm

कविता पर यहाँ इतनी अच्छी प्रतिक्रिया मिलेंगी , यह मैंने कभी नहीं सोचा था . सभी को होली की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाऐ .

Comment by Omprakash Kshatriya on March 11, 2014 at 8:27pm

मनोज जी मैंने कही मधुकर  को कृष्ण के रूप में पढ़ा है .

Comment by Omprakash Kshatriya on March 11, 2014 at 8:25pm

शिज्ज शंकर जी आप के प्रोत्साहन के लिए आभार 

Comment by Omprakash Kshatriya on March 11, 2014 at 8:24pm

सुजान जी आप का शुक्रिया 

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