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फ़ितूर (दीपक कुल्लुवी)

मेरे अंजुमन में रौनकें बेशक़ कम होंगी ज़रूर
क्या सोच के दोज़ख़ की तरफ़ चल दिए हज़ूर


आपने तो एक बार भी मुड़के देखा नहीं हमें
न जानें था किस बात का अपने आपपे गरूर


यह वक़्त किसी के लिए रुक जाएगा यहाँ 

निकाल देना चाहिए सबको दिमाग़ से यह फ़ितूर


चढ़ जाए एक बार तो हर्गिज़ उतरता ही नहीं
क़लम का हो शराब का हो या शबाब का हो सरूर


मासूम से थे हम 'दीपक' शायर 'कुल्लुवी'हो गए
हमसे क्या आप खुद से भी हो गए बहुत दूर

दीपक कुल्लुवी
पाराद्वीप उड़ीसा
17-4-14

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 18, 2014 at 11:32am

आदरणीय दीपक जी
सुंदर ग़ज़ल कही है आपने. मेरी तरफ से दाद हाजिर है..

पर इसी को आपने बे'हर में लिखा होता तो रचना में चार चाँद लग जाते

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 18, 2014 at 11:17am

आदरणीय कुल्लुवी जी एक अच्छी रचना के लिए बधाई .

कृपया ध्यान दे...

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