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इक और गुज़रा दिन समेटा याद में इसको;
...दफ़न हो जाएँगी अब ये मेरे मन कि दराजों में;
जो आये वक़्त परिचित तब मिलेगी रूह फिर इनको;
नहीं तो सिलवटें पड़ती रहेंगी इन मजारों में.
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वेदना कुछ भी नहीं, तब ह्रदय इतना मौन क्यों है;
क्यों हम अब भी स्वप्नते हैं, स्मृतियाँ भूली भुलाई ;
आस भी है, प्यास भी है, रौशनी कुछ ख़ास भी है;
मन हैं इतने पास अपने, हाथ लेकिन दूर क्यों हैं.
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दूर रह कर दूर रहना बेहतर है;
पास रहकर दूर रहना इक सज़ा है;
जाम है पर होंठ तक आने न पाता;
अब स्वयं संतोष करने में रज़ा है.
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निराशाओं के काले घन में जब मैं डूब जाता हूँ,
दिखाते इन्द्रधनुषी रंग मुझको, तुम सदा हंसकर;
विवश हो जाऊंगा तब मैं, चले जाओगे जब तुम कल;
मुझे कुछ लड़खड़ाने दो, संभल जाऊंगा मैं मरकर.
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क्यों नाराज़ होते हो, मेरे दरख्वास्त करने पर;
महज़ यादें ही मांगी है कोई जीवन नहीं माँगा;
कभी झकझोर दे तुमको कोई बादल का यदि टुकड़ा;...
तो करना याद उसको जो तुम्हारी नींदों में जागा.
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चले जाओ कहीं तुम पर बहारें छोड़ कर जाना;
नया गुलशन तुम्हारे साथ नयी जगह बस जाएगा;
हमारा क्या है, बस यही दरखास्त करते हैं;...
गगन में देखते रहना, पतंग को भूल मत जाना.
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ज़मीन पर हैं कदम फिर भी निगाहें आसमान पर हैं;
पतंग का मेल होना है किसी बादल के टुकड़े से...
ज़रा सी ढीली कर दो डोर की आतुर अब ये मन फिर है;
पूरे हो जायेंगे सपने जो अब तक थे अधूरे से....
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कहता रहा सदा यह तुमसे व्यस्त कार्य की रातों में;
पूर्ण तुम्हारी ख्वाहिश कर दूँ पर मुझको विश्राम कहाँ;
एक भगीरथ निकल चुकी है इन ललचाई आँखों से;
परिचित हो लें फिर से हम पर वो अनजानी सांझ कहाँ.......
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