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कुछ आंसू छुपाके रखे थे मैंने..

सबसे कठिन वक़्त के लिए..
खुद को मज़बूत बनाने के लिए..
हर वक़्त मुस्कुराने के लिए..
लेकिन.. तुमने छीन लिए..

कुछ ख़्वाबों के घरोंदे बनाए थे मैंने..
नम आँखों को सजाने के लिए..
कुछ पल स्वप्नलोक में जी पाने के लिए..
अपना वजूद समझने -समझाने के लिए..
लेकिन..तुमने छीन  लिए..

अब..अब बाकी है क्या जो मुझसे मांगते हो तुम..
तोड़ कर मेरा यकीन ,अब क्या चाहते हो तुम..
व्यर्थ ही जानवरों को कोसते हैं इंसान..
जो जानवर बोलते हम जैसे ,तो बताते क्या हो तुम!
मुझसे मेरे एहसास ..तुमने छीन लिए..

क्यों मैं आई थी तेरे साथ ,त्याग के माँ-बाबा का घर..
उनके विश्वास को तोड़कर ,घर से भाग कर..
चार दिन संग रहे , जादुई दुनिया का झांसा देकर..
घर देने का स्वप्न दे कर दी ठोकर ,किया बेदर,बेंचकर..
लो..हिसाब बराबर ..
तुमसे जीने के हक आज मैंने ..छीन लिए..

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