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तुम नीलाभ
नीरव गगन में
ध्रुवतारे की तरह
अविचल
कैसे रह लेते हो?
शायद तुममें
मानव-मन की
विचलन
का बोध नहीं .

या स्थितिप्रज्ञ हो गए हो.

विजयप्रकाश
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 19, 2014 at 1:56pm

आ० विजय निकोर जी,प्रशंसा के लिए बहुत- बहुत आभार.

Comment by vijay nikore on June 19, 2014 at 1:48pm

अति सुन्दर प्रस्तुति। बधाई विजय जी।

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 18, 2014 at 9:37am

आदरणीय
सौरभ पाण्डेय जी ,
नमस्कार -
हार्दिक आभार।
स्नेह बनाये रखें .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 18, 2014 at 2:11am

कर्म करते हुए भी उससे प्रभावित न होना या कर्म के प्रति दायित्वबोध किन्तु अपेक्षा कोई नहीं, जैसी उच्च भावना को आपने शब्दबद्ध किया है, आदरणीय विजय प्रकाश जी. ऐसे कर्म संधान को कर्मयोग कहते हैं तथा ऐसे कर्मरतों को ही कर्मयोगी कहते हैं. यह अवश्य है कि स्थितप्रज्ञ की अवस्था चैतन्य-अवस्था का चरम पहलू हुआ करता है. यह निर्विकार एवं निर्लिप्त मनस का परिचायक अवश्य है, किन्तु, निठल्लेपन का पर्याय नहीं.
आपकी इस सचेत प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद
सादर

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 12, 2014 at 8:13pm

आभार अन्नपूर्णा जी.

Comment by annapurna bajpai on June 12, 2014 at 7:36pm

सुंदर भाव !! 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 12, 2014 at 7:29pm

आभार गिरिराज भाई.स्नेह बनाये रखें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 12, 2014 at 5:42pm

आदरणीय विजय भाई , स्थिति प्रज्ञता पर सामान्य तौर पर होने वाली जिज्ञासा को सुन्दर शब्द मिले हैं , बधाई ॥

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 11, 2014 at 12:51pm

धन्यवाद .

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 11, 2014 at 11:30am

डॉ. प्राची!आभार
आपने तो भगजोगनी (जुगनू ) को चाँद बना दिया.

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