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2122 1122 22

बिजलियाँ हैं न हवा सावन में

गुज़री बेआब घटा सावन में

 

गर्म रातें ये सहर भी बेचैन

यूँ बुरा हाल हुआ सावन में

 

गुल खिले हैं न शिगूफ़े हँसते

है न रंगों का पता सावन में

 

खेत तालाब शजर भी सूखे

आसमाँ सूख गया सावन में

 

मुन्तज़िर सर्द फुहारों के अब

थक गई है ये फ़िज़ा सावन में

 

याद आती है हवा की ठण्डक

सब्ज़रंगी वो रिदा सावन में

 

मुन्तज़िर= इन्तज़ार में

शिगूफ़ा = कली

सब्ज़रंगी = हरे रंग की

रिदा = चादर

 

-(मौलिक, अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 8:08pm

आदरणीय सौरभ सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 8:08pm

आदरणीय गिरिराज सर आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 8:08pm

आदरणीय डॉ आशुतोष सर आपका हार्दिक आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2014 at 12:52am

खेत तालाब शजर भी सूखे

आसमाँ सूख गया सावन में.. . वाह !

इस ग़ज़ल केलिए ढेर सारी दाद, शिज्जू भाईजी.. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2014 at 7:30am

आदरणीय शिज्जु भाई , उचित समय मे आपकी उचित श्रावणी गज़ल बहुत सार्थक और सुन्दर लगी , आपको दिली बधाइयाँ ॥

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 4, 2014 at 5:11pm

आदरणीय शिज्जू जी ..क्या जबर्दस्त ग़ज़ल ..मौसम के आज कल के हाल का बखूबी चित्रन किया है आपने ..तमाम उर्दू के शब्द सीखने को मिलते हैं ..आपकी इस शानदार रचना पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 4, 2014 at 2:01pm

आदरणीया मंजरी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 8:46pm
आदरणीय शिज्जु शकूर जी सावन में कई रंग जीवन के दिख गए। ग़ज़ल अच्छी लगी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 3:42pm

आदरणीय गोपाल नारायण सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने रचना को समय दिया एवं सराहा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 3:42pm

आदरणीय सुशील सरना सर रचना की सराहना के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया

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