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अपने औदें पर इतना अक़ड़ता क्यूं हैं...........

अपने औदें पर इतना अक़ड़ता क्यूं हैं
तू बात बात पर यूं बिगड़ता क्यूं हैं

क्या संसद का पानी पी आया हैं
तू बार बार यूं रंग बदलता क्यूं हैं

लिबास तो बड़ा ही सफ़्फ़ाख है तेरा
फ़िर आईने से इतना डरता क्यूं हैं

फ़ट पड़ेगा गुस्सा आवाम का एक दिन
गुनाहों से अपना घड़ा भरता क्यूं हैं

'अमि' का देश है ये कोइ थाली तो नही
खाता है इसमें, तो छेद करता क्यूं हैं

                                          - अमि'अज़ीम'

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Comment by अमि तेष on March 10, 2011 at 5:50pm
विवेक जी शुक्रियां...
Comment by विवेक मिश्र on March 5, 2011 at 11:21pm
मतला और मकता दोनों ही बेमिसाल हैं. दाद कबूल करें.
Comment by अमि तेष on March 5, 2011 at 8:10pm
thanks Rashmi ji............
Comment by rashmi prabha on March 5, 2011 at 4:03pm

क्या संसद का पानी पी आया हैं 
तू बार बार यूं रंग बदलता क्यूं हैं ... kataksh badhiyaa hai

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