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ये मेरी वाली है (लघुकथा) // --शुभ्रांशु पाण्डेय

 जैऽऽ…….दुर्गामइया की जैऽऽऽ……

नाव के एकबारगी हिचकोले खाने के साथ ही दुर्गा एवं संलग्न प्रतिमाओं का विसर्जन हो गया. माता, माता के शृंगार, शेर के अयाल, महिष के सींग, असुर की फैली भुजायें, सबकुछ एक साथ जल में समाने लगे.  

मूर्ति के साथ साथ मनुआ भी पानी में कूदा. उसे न तो दानव का कोई डर था, न उसे माता के आशीर्वाद चाहिये थे.

“अबे.. ये मेरी वाली है..”, कहता हुआ वो डूबती हुई प्रतिमाओं की ओर तैर चला.

उसे उनके पास बाकियों से पहले पहुँचना था, ताकि आने वाली ठंड में अम्मा-बाबूजी को तापने के लिये लकड़ी के पटरों और खपच्चियों का इंतजाम हो सके.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 27, 2015 at 2:57pm

//अपनी बात कहना और समझाना कब से इस मंच पर पाठक की तौहीन की तरह देखा जाने लगा//

मैंने कब कहाँ कि यह पाठक की तौहीन है ? पाठक तो अपना मंतव्य ही देगा, उससे सहमत या असहमत होना लेखक का अधिकार है.

आपका कहना बिलकुल सही है, सभी लोग अलग अलग सोचते हैं.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 27, 2015 at 2:49pm

आदरणीय गणेश भैया,

//आपकी लघुकथा है यदि आप शीर्षक से संतुष्ट है तो एक पाठक को ठीक लगने ना लगने से क्या फर्क पड़ता है.//

अपनी बात कहना और समझाना कब से इस मंच पर पाठक की तौहीन की तरह देखा जाने लगा, आपने भी कहा है कि

//यदि मैं लिखता तो इसका शीर्षक होता ...जरुरत //

इसका अर्थ ये है कि आपने भी कुछ सोचा फ़िर ये बात कही. अगर सभी एक फ़ार्मेट मे सोचने लगे तो साहित्य साफ़्ट्वेयर प्रोग्रामिंग हो जायेगा. फ़ीड करो और रिजल्ट लो.

इसी बात को  आदरणीय योगराज जी ने भी कहा है लेकिन जैसा मुझे उस समय लगा था वो मैने लिखा था. अब आगे मैं इस दिशा में ज्यादा ध्यान दूंगा. 

सादर.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 27, 2015 at 2:20pm

आपकी लघुकथा है यदि आप शीर्षक से संतुष्ट है तो एक पाठक को ठीक लगने ना लगने से क्या फर्क पड़ता है.

सादर. 

Comment by Shubhranshu Pandey on May 27, 2015 at 2:08pm

आदरणीय गणेश भैया,

जरुरत तो सबकी थी.

लेकिन यहां बात उस जरुरत को पूरा करने के लिये मची होड़ से है. जहां देवी की प्रतिमा पर भी अधिकार जताना पड़ रहा है और बताना पड़्ता है कि..... ये मेरी वाली है.

सादर.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 26, 2015 at 6:06pm

कथा अच्छी हुई है, शीर्षक बिलकुल ठीक नहीं लग रहा. यदि मैं लिखता तो इसका शीर्षक होता ...जरुरत 

बधाई इस प्रस्तुति पर.

Comment by Shubhranshu Pandey on October 9, 2014 at 9:59pm

आदरणीय जितेन्द्र जी कथा के मर्म को समझ कर विचार देने के लिये घन्यवाद.

Comment by Shubhranshu Pandey on October 9, 2014 at 9:58pm

आदरणीया वेदिका जी. विचार रखने के लिये धन्यवाद.

Comment by Shubhranshu Pandey on October 9, 2014 at 9:57pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी,

इस तरह के नजारे आपको हर जगह देखने को मिल जायेंगे...कथा को समर्थन दे कर विचार देने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद. सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on October 9, 2014 at 9:56pm

आदरणीय योगराज सर,

कुछ धमाकेदार शीर्षक सोच रहा था और मेरी नजर पात्र द्वारा कहे गये लाइन पर गयी जो मुझे मुफ़ीद लगी इसी से मैने उसका शीर्षक दे दिया. वैसे अगर बुरा ना माने तो आप इस मामले में मेरी सहायता कर सकते हैं...ये मेरे लिये भी सीखने का सबब होगा...

मुझे हौसला देने के लिये घन्यवाद.

सादर

Comment by Shubhranshu Pandey on October 9, 2014 at 9:48pm

आदरणीय विनय कुमारजी, कथा पर विचार देने के लिये धन्यवाद.

कृपया ध्यान दे...

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