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अतुकांत कविता : हिंसा (गणेश जी बागी)

मारते हो पशु
फैलाते हो हिंसा
'नीच' जाति के हो न
असभ्य कहीं के
कभी नहीं सुधरोगे
इतिहास गवाह है...


मारते तो तुम भी हो
'शिकार' के नाम पर
तुम तो 'नीच' न थे
याद है ?
वो शब्द भेदी बाण
जो असमय वरण किया था
अंधों के पुत्र का,
भागे थे हिरण के पीछे
चर्म चाहिए था न
इतिहास गवाह है...


हिंसक तो तुम दोनों ही हो
एक शौक के लिए
तो दूजा भूख के लिए
हाँ जी हाँ, बिलकुल
इतिहास गवाह है ।

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => लघुकथा : सोशल स्टडी

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 18, 2015 at 10:10pm

प्रिय सोमेश जी, सराहना हेतु बहुत बहुत आभार, किन्तु इस प्रस्तुति में महाभारत का कोई सन्दर्भ नहीं है.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 18, 2015 at 10:09pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी, आपकी सकरात्मक प्रतिक्रिया इस रचना को प्राप्त हुई लेखन कर्म सार्थक हुआ, बहुत बहुत आभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 18, 2015 at 10:06pm

इस अतुकांत रचना पर प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय गुमनाम जी और प्रिय महर्षि जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 18, 2015 at 10:04pm

आदरणीय खुर्शीद खैराड़ी जी, उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु हृदय से आभार स्वीकार करें.

Comment by somesh kumar on February 9, 2015 at 10:58pm

जीवन की आवश्कता से लेकर केवल क्रीडा और मनोरंजन के लिए शिकार और शब्दों से मन का शिकार करने का महाभारत को सन्दर्भ ,सुंदर और गम्भीर रचना आदरणीय |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 8, 2015 at 8:39pm

इस सकरात्मक प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय अरुन कुमार निगम जी. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 8, 2015 at 8:37pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी भाई साहब, आपकी प्रतिक्रिया लेखन कर्म को सार्थक कर गयी,  बहुत बहुत आभार.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 8, 2015 at 8:36pm

आदरणीय बागी सर ..इस चिंतन प्रधान सोचने के लिए बिबश करती शानदार रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 8, 2015 at 8:36pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, आपकी टिप्पणी सदैव प्रोत्साहित करती है, इस सराहना युक्त प्रतिक्रिया पर बहुत बहुत आभार.

Comment by maharshi tripathi on February 8, 2015 at 7:56pm

अच्छी रचना पर आपको बधाई आ. बागी जी |

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