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कुँवारी देवी ( लघुकथा)

वो कहना चाहती थी कि वो देवी नही है वो तो मुन्नी है । उसे रानो और शन्नो के साथ खेलने जाना था बाहर ।
"ये लोग चुनरी ओढाय उसे कहाँ बिठाय दिये हैं । माँ , मै देवी नही रे , तेरी मुन्नी हूँ .. काहे ना चिन्हत मोरा के । "
दर्शन की रेलम पेल , मां -बापू चढावे के रकम की खनक समेटने में लगे हैं । गाँव के माइक वाले ,पंडित ,हलवाई सबके भाग सँवर गये ।
"अब तो देवी का समाधिस्थ होना परम जरूरी हो गया है ।" -बिसेसर गहरी सोच में डूबा हुआ था ।

मौलिक और अप्रकाशित

कान्ता राॅय
भोपाल

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Comment by kanta roy on May 21, 2015 at 12:56am
आभार आपको आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी कथा पर सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु । सही कहा आपने कि इस पर बहुत कहानिया और फिल्म भी बन चुकी है लेकिन यह जड़ है कि खत्म ही नहीं होती है । बाबा और देवी आज भी अपना आसन जमाये बैठे है और लोग पिछली सब बातों को भूल कर उन्हीं को दोहरा रहे है । आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 20, 2015 at 8:36pm

अंधविश्वास और लालच के ताने बाने में विवशता की ढाल वाली कुरीति पर प्रभावकारी लघुकथा. यद्यपि विषय पुराना और जाना पहचाना है किताबों/फिल्मों में इस विषय पर बहुत पढ़ा और देखा है फिर भी विषय का पुनर्पाठ अपना प्रभाव छोड़ता है 

आदरणीया कांता जी बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर 

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