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नीली ओढ़नी
रात की चादर
पसरे तारे

 

फूटी है भोर
जागते अरमान
आशा किरण

 

नई रौशनी
उजालों का सफर
बढ़े काफिले

 

साँझ की बेला
सूरज परछाईं
ढलता दिन

 

जीवन चक्र
चलता जाता यूँ ही
बीतते दिन

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 6, 2011 at 10:47am
प्रणाम दीदी, हम लोगो ने भी आपकी कमी को बड़ी सिद्दत से महसूस कर रहे थे | आपकी उपस्थिति हमलोगों को उर्जन्वित करती है |
Comment by Neelam Upadhyaya on April 6, 2011 at 10:05am
गणेश जी, नमस्कार । बहुत-बहुत धन्यवाद । पिछले कुछ दिनों से बहुत चाह कर भी मैं ओ बी ओ पर अपनी उपस्थिति अधिक दर्ज नहीं करा पाई । अब  स्थितियाँ  कुछ सामान्य हुई हैं तो फिर से आना शुरू किया है । इस दौरान ओबीओ का बहुत  miss किया ।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 4, 2011 at 7:41pm
नीलम दीदी , पूर्व में भी आपने बहुत ही सुंदर सुंदर हाईकू लिखी है , उसी कड़ी में ये हाइकू भी खुबसूरत है , आभार |

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