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Neelam Upadhyaya's Blog (49)

हाइकू

न कर जिक्र

जब तक है जान

काहे की फिक्र

 

मन अंतस

जजवातों से भरा

पर अकेला

 

धरते धीर

शिखर पहुँचते

बैसाखी पर

  

क्या पा लिया था

ये तब जाना, जब

उसे खो दिया

खुशी ही नहीं

तल्खियाँ भी देती हैं

तनहाईयाँ

 

… मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on July 10, 2018 at 4:00pm — 15 Comments

जीवन यथार्थ

संवेगों के झंझावात में

बहती रही सारी खुशियाँ

इतनी क्षणिक सिद्ध हुईं

आंसुओं के समंदर

डुबोते चले गए यादों को

इतनी कमजोर निकलीं

खामोशियों के बीच

गुस्से बदल गए नफ़रतों में

इतने अप्रत्याशित थे

आशाएँ और अभिलाषाएं

सिसक रही कहीं

दम तोड़ती सी ज्यों

पर जीवन की जुगुत्सा

जूझना सिखाती परिस्थिति से

सबक का एहसास कराते

सौहर्द्र, प्रेम और संभावनाओं का

निरंतरता, यथार्थता , शाश्वतता

यही जीवन है…

Continue

Added by Neelam Upadhyaya on July 5, 2018 at 3:20pm — 14 Comments

अब तो आओ मेघ

बहुत हुआ सूरज का तपना

अब तो आओ मेघ

जम कर बरसो मेघ

 

तपती धरती का सीना हो ठंढा 

सूखी मिट्टी महके सोंधी

बंजर सी जमीं पर

अब फैले हरियाली

ठूंठ बन गए  पेड़ों के

पत्ते  अब हरियाएँ 

नभ पर जमकर छा जाते

गरज का बिजली कड़काते

संग में वर्षा भी  लाते

गर्मी डरकर जाती भाग

मौसम हो जाता खुशहाल

पर बादल तो

इधर से आये उधर गए

हम तो आस ही लगाए रहे

खुली चोंच लिए पक्षी

प्यासे ही रह गए

खेत जोतने को

हल लिए किसान…

Continue

Added by Neelam Upadhyaya on June 30, 2018 at 3:25pm — 8 Comments

हाइकू

अरण्य घन

सुन स्वर लहरी

मादल थाप

  

पवन मंद

बिखरे मकरंद

नव अंकुर

  

ढीठ हवाएँ

पत्ते बुहार रहीं

पतझड़ में

  

पर्वत नाले

पार करती चली

चंचल नदी

 

 मेघ ढिठौना

तपते आकाश में

बरसेगा क्या

… मौलिक एवं अप्रकाशित

(मादल की थाप का प्रसंग आशापूर्ण देवी जी की कहानी से )

 

 

Added by Neelam Upadhyaya on June 25, 2018 at 3:00pm — No Comments

हाइकू

अंबर अटा

रेगिस्तानी धूल से

जीना मुहाल

 

 

चढ़ती धूप

सुस्ताने भर ढूँढे

टुकड़ा छांव

 

 

खड़ी है धूप

छांव से सटकर

प्रतीक्षा सांझ

 

कटते पेड़

मौन रोता जंगल

सुनता कौन

 

 

… मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on June 20, 2018 at 3:30pm — 12 Comments

पापा तुम्हारी याद में

जीवन की पतंग

पापा थे डोर

उड़ान हरदम

आकाश की ओर

पापा सूरज की किरण

प्यार का सागर

दुःख के हर कोने में

खड़ा उनको पाया

छोटी ऊँगली पकड़

चलना मुझको सिखलाया

हर उलझन को पापा

तुमने ही सुलझाया

हर मुश्किल में पापा

प्यार हम पर बरसाया

मेरे हर आंसू ने

तुम्हारी आँखों को भिगोया

मेरे कमजोर पलों में

मेरा विश्वास बढ़ाया

तुम से बढ़कर पापा

प्यार न कोई पाया

प्यार न कोई पाया।

मौलिक एवं…

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Added by Neelam Upadhyaya on June 17, 2018 at 6:05pm — 15 Comments

हाइकू

झरता रहा

माँ के आशीर्वाद सा

हरसिंगार

 

उषा की लाली

रेशम का आँचल

वात्सल्य माँ का

पुलक तन

शाश्वत है बंधन

नमन मन

  

स्नेहिल स्पर्श

वात्सल्य का कंबल

संबल मन

 …

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on June 14, 2018 at 12:30pm — 10 Comments

कुछ हाइकु

तुम जो आए

पत्ते हरे हो गए

पतझड़ में ।  

 

सूखे गुलाब

किताब में अब भी

खुशबू भरे ।

 

 

माँ तो सहती

एक सा दर्द, पर  

बेटी पराई ?

 

 

बढ़ती उम्र

घटती हुई सांसें

जिये जा रहे ।

 

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on May 10, 2018 at 2:04pm — 10 Comments

बेटी का विवाह

रामप्रसाद जी की इकलौती बेटी की शादी थी । सुबह से गहमा-गहमी लगी हुयी थी । रामप्रसाद जी का सबके साथ इतना अच्छा व्यवहार था उनके अड़ोस-पड़ोस में रहने वाले भी इस विवाह को लेकर उतने ही उत्साहित थे जितने स्वयं रामप्रसाद जी । रामप्रसाद जी के बराबर वाले घर में रहने वाले मोहनलाल जी से कभी छोटी बातों को लेकर हुयी कहा-सुनी इतनी बढ़ गयी थी कि आपस में एक-दूसरे को देखना तो क्या नाम भी सुनना पसंद नहीं था । इस वजह से मोहनलाल जी को विवाह में शामिल होने का बुलावा भी नहीं भेजा था उन्होने । रामप्रसाद जी कि पत्नी…

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Added by Neelam Upadhyaya on April 19, 2018 at 4:04pm — 12 Comments

योजना

हवा खामोश है

फिजा भी उदास

बाजार सजा है

नफ़रतों का

मंदिर, मस्जिद, गिरजा,

क्या देखें

सभी जैसे निर्विकार

सड़कें तो पट गयी

जिंदा लाशों से

इंसानियत मर रही

आस दरक रही

सियासत व्यस्त है

दरकार दबाने में

अभिलाषा बुझ रही

आँसू निकलते नहीं

शब्द बोलते नहीं

'कठुआ', 'उन्नाव', 'दिल्ली,

'…………', '……….'

और कितने…

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Added by Neelam Upadhyaya on April 17, 2018 at 12:20pm — 7 Comments

कुछ हाइकु

पढ़ाते रहे

कभी पढ़ जो पाते

बच्चे का मन ।

 

आदर्शवाद ?

हुआ किताबी भाषा

धूल फाँकता ।

 

घर आँगन

सूना, मन उदास

बची है आस

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on April 12, 2018 at 12:52pm — 6 Comments

कुछ हाइकु

बीत जाएगी

जिंदगी, काटो मत

जीवन जियो

 

पतंग जैसे

डोर है जिंदगी की

उड़ी या कटी

 

नहीं टूटते

अपनत्व के तार

आखिर यूँ ही

 

 सूर्य ग्रहण

हार गया सूरज

परछाई से

नदी बावरी

सागर में समाना

अभीष्ट जो था

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

 

Added by Neelam Upadhyaya on March 14, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

कुछ हाइकु

झूमी सरसों

धरती इतरायी

फगुनाहट

 

बसंत आया

ओढ़ पीली चुनर

खेत बौराया

 

बौर आम के

फैल गयी सुगंध

झूमा बसंत

 

टेसू क्या फुले

अंगड़ाया पलाश

फागुन आया

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

 

Added by Neelam Upadhyaya on February 22, 2018 at 4:47pm — 3 Comments

हाइकू

फिर आ गया

नववर्ष लेकर

नयी उमंग ।

 

नयी सौगात

उम्मीद की किरण

नव वर्ष में ।

 

जन जीवन

चमकें उल्लास में

नव वर्ष में ।

 

यादों का रेला

खामोश समंदर

बहा जो पाता ।

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on January 2, 2018 at 2:44pm — 6 Comments

कुछ हाइकू

 

सूखी सी शाख

बैठा पंछी अकेला

पतझड़ में ।

 

नयी नवेली

लाजवंती वधू सी

सिमटी धूप ।

 

सूरज जब

अलसाया, चल पड़ा

क्षितिज पार ।

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on December 21, 2017 at 2:34pm — 9 Comments

हाइकु

ठिठुरी अम्मा
धूप तो लाजवंती
दुपहरी में ।

कच्ची सी उम्र
नौकरी खँगालता
खाली है झोली

मान न मान
जिंदगी के दो रंग
जीना मरना


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on December 14, 2017 at 4:00pm — 8 Comments

रजिस्ट्री

"चाचा, ईहाँ हमनीके बानी सन । तूँ कतहीं अऊरी जा के सूत जा ।"



नन्द किशोर जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । बड़े भाई की जो लड़कियां उनके कंधों पर खेल कूद कर बड़ी हुयी आज उन्होंने ही उन्हें घर से बाहर जाने के लिए कह दिया, वो भी ऐसे मौके पर जब बड़े भाई की तेरहवीं का सारा काम उन्होने आज ही निपटाया था ।



नन्द किशोर जी अपने पिता के एकलौते पुत्र थे और श्रीनाथ जी, जिनकी आज तेरहवी थी, उनके ताऊजी के पुत्र थे। समय के साथ परिवार बड़ा हुआ तो संयुक्त परिवार का भी बटवारा हो गया । बटवारे के… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on December 12, 2017 at 3:48pm — 2 Comments

भाग्य

एक कार आकर रज़ाई बनाने वाले की दुकान के आगे खड़ी हुयी । कार के पिछले दरवाजे से साहबनुमा व्यक्ति बाहर निकला । दुकान वाले की बांछें खिल गईं । भला कौन इस तरह उसकी दुकान पर इतनी बड़ी गाड़ी लेकर आता है ।

दुकानदार से उन्मुख होते हुए साहब ने छोटे साइज़ के रज़ाई, गद्दा, तकिया और चद्दर दिखने को कहा । दुकानदार ने सोचा साहब को अपने छोटे बच्चे के लिए ये सब चाहिए, सो बड़े उत्साह से चीजें दिखने लगा । पर साहब ने बताया कि उन्हें ये सब समान अपने "डौगी" के लिए लेना है ।…

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Added by Neelam Upadhyaya on December 7, 2017 at 10:30am — 8 Comments

लघु कथा - पगडंडी

काले कोलतार की चमक लिए पक्की सड़क । वहीं बगल में थोड़ी निचाई पर पक्की सड़क के साथ-साथ ही चलती एक पगडंडी ।

सड़क पर लोगों की खूब आमोदरफ्त रहती, गाड़ियों का आवागमन रहता । अपना मान बढ़ता देख सड़क इतराती रहती । एक दिन उसने पगडंडी से कहा – "मेरे साथ चल कर क्या तू मेरी बराबरी कर लेगी ।  कहाँ मैं चमकती हुयी चिकनी सड़क और कहाँ तू कंकड़-पत्थर से अटी हुयी बदसूरत सी पगडंडी । महंगी से महंगी और बड़ी से बड़ी गाडियाँ मेरे ऊपर से आराम से गुजर जाती हैं । और तू...हुंह... ।" क्यों अपना समय बेकार करती है । यहीं रुक…

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Added by Neelam Upadhyaya on March 27, 2017 at 2:00pm — 3 Comments

भाड़ा

 

"साहेब, कोई पुराना चद्दर हो तो दे दीजिये । बहुत ठंढा गिरने लगा है । कोई पुराना चद्दर दे दीजिये ।"

 

यूं तो वर्किंग डे पर रात के किसी भी आयोजनों में जाने का प्रोग्राम कम ही बनता है । लेकिन फिर भी कभी-कभी कुछ ऐसे मौके भी आ ही जाते हैं जब इस तरह के किसी आयोजन में जाना पड़ जाता है । ऐसे ही एक आयोजन को अटेण्ड कर वापस आते-आते रात के साढ़े ग्यारह बज गए । गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन से घर तक जाने के लिए आटो…

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Added by Neelam Upadhyaya on March 14, 2017 at 4:23pm — 4 Comments

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