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तुम जो आए

पत्ते हरे हो गए

पतझड़ में ।  

 

सूखे गुलाब

किताब में अब भी

खुशबू भरे ।

 

 

माँ तो सहती

एक सा दर्द, पर  

बेटी पराई ?

 

 

बढ़ती उम्र

घटती हुई सांसें

जिये जा रहे ।

 

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Neelam Upadhyaya on May 22, 2018 at 2:12pm

आदरणीय उस्मानी  जी, नमस्कार ।  बहुत बहुत आभार ।  आप सभी गुणीजनों के मार्गदर्शन की हमेश आकांक्षी रहूंगी। 

Comment by Neelam Upadhyaya on May 22, 2018 at 2:10pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी, नमस्कार ।  बहुत बहुत आभार । 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 14, 2018 at 12:55pm

बेहतरीन सृजन। इशारों में संदेश। हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आदरणीया नीलम उपाध्याय जी।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 11, 2018 at 1:01pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नीलम जी।बेहतरीन हाइकू।

Comment by Neelam Upadhyaya on May 11, 2018 at 12:23pm

आदरणीय समर कबीर जी, बहुत बहुत आभार। 

Comment by Neelam Upadhyaya on May 11, 2018 at 12:22pm

आदरणीय मुहम्मद आरिफ जी, हाइकू की तारीफ के लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Neelam Upadhyaya on May 11, 2018 at 12:20pm

आदरणीया बबिता जी, आपका बहुत आभार। 

Comment by Samar kabeer on May 11, 2018 at 11:01am

मोहतरमा नीलम उपाध्याय जी आदाब,अच्छे हाइकू हुए हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on May 10, 2018 at 6:40pm

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी आदाब,

                                प्रेम की व्यंजना , एक माँ की पीड़ा और ढलती उम्र के दर्द की बेबसी को रेखांकित करते बेहतरीन हाइकु । हार्दिक बधाई स्वीकार करेंं ।

Comment by babitagupta on May 10, 2018 at 6:14pm

आदरणीया दी,बहुत ही उम्दा रचना,बधाई स्वीकार कीजिएगा.

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