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हवा खामोश है

फिजा भी उदास

बाजार सजा है

नफ़रतों का

मंदिर, मस्जिद, गिरजा,

क्या देखें

सभी जैसे निर्विकार

सड़कें तो पट गयी

जिंदा लाशों से

इंसानियत मर रही

आस दरक रही

सियासत व्यस्त है

दरकार दबाने में

अभिलाषा बुझ रही

आँसू निकलते नहीं

शब्द बोलते नहीं

'कठुआ', 'उन्नाव', 'दिल्ली,

'…………', '……….'

और कितने ?

अनगिनत योजनाएँ, पर

क्या घावों पर मरहम की

बनी है कोई योजना ?

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

 

 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2018 at 8:01pm

आ. नीलम जी,
तेवर और पीड़ा से भरपूर रचना के लिए बधाई 
सादर 

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 10:53am

आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी, उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार । आप सभी गुणीजनों से मार्गदर्शन का आग्रह रहेगा।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 10:49am

आदरणीय समर कबीर जी, नमस्कार । उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 10:48am

आदरणीय तेजवीर जी, नमस्कार । उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 17, 2018 at 8:16pm

आदरणीया नीलम जी आपकी रचना समसामयिक घटनाओं को चरितार्थ करती हुई विल्कुल यथार्थ परक अनमोल रचना है इसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 6:12pm

मोहतरमा नीलम उपाध्याय जी आदाब,बहुत उम्दा रचना,बहतरीन कटाक्ष,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 17, 2018 at 12:56pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नीलम जी। बहुत सुंदर और समसामयिक कविता।

कृपया ध्यान दे...

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