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व्यंग्य - फ्लैटों का आदर्श जुगाड़

वैसे देश में भ्रष्टाचार का बखेड़ा जहां-तहां छाया हुआ है। हर जुबान की शोभा केवल भ्रष्टाचार ही बढ़ा रहा है। कुछ महीनों पहले जब आदर्श सोसायटी के फ्लैटों का घोटाला उजागर हुआ, उसके बाद एक के बाद एक कई बडे़ भ्रष्टाचार हुए। जाहिर सी बात है, जब बात बड़ी-बड़ी हो रही हो तो छोटी बातें भला कहां ठहर सकती हैं ? खुद का नहीं, अपनों का फ्लैट के प्रति मोह ने बड़ी शख्सियतों की कुर्सी ले डूबी। ऐसा ही नजारा आदर्श सोसायटी घोटाले में दिखा। भ्रष्टाचार के बड़े भाईयों के पदार्पण बाद, कैसे कोई इन छोटे-मोटे घोटाले को याद करने की सोच सकता है ? मगर कई महीनों बाद भी फ्लैटों के आदर्श घोटाले मुझे याद हैं। इसका कारण भी है, क्योंकि मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां मेरा न कोई मकान है और न ही कोई फ्लैट। केवल किराए के एक छोटे से मकान का सहारा है। ऐसे में फ्लैट में रहने की खुशकिस्मती पाने का कीड़ा मुझे रोज काटता है और मैं हर पल बेचैन हो जाता हूं। मगर मेरी किस्मत उन लोगों जैसी कहां, जिनके पास उंची पहुंच का चाबुक है ?

आदर्श सोसायटी की बंदरबाट जानने के बाद, मेरा मन बार-बार फुदक रहा है कि कैसे भी करके एक फ्लैट का जुगाड़ करना ही है। जब आदर्श सोसायटी के फ्लैट पाने में नामी-गिरामी अपना जुगाड़ भिड़ा सकते हैं तो मैं पीछे क्यों रहूं। सोच रहा हूं, जब भी शहर में इस तरह के फ्लैट बनाए जाएंगे, तब जरूर कुछ न कुछ जुगाड़ लगाउंगा। तभी एक सुंदर आशियाना का मेरा सपना पूरा हो पाएगा। देखा जाए तो एक फ्लैट बनवा पाना मेरे जैसे एक छोटे से लिख्खास के लिए मुश्किल ही है। फ्लैट में पैर पसारने का सुख पाने के लिए जुगाड़ ही सबसे बढ़िया व सरल तरीका है। यही कारण है कि मेरी नजर आदर्श सोसायटी जैसे फ्लैटों पर ही टिकी हुई है और इसी चिंता में हूं कि चाहे जितना भी तीन-पांच करना पड़ जाए, किसी का फ्लैट हड़पना पड़ जाए, फिलहाल मेरा एक ही मकसद रह गया है, फ्लैट का आदर्श जुगाड़, कयोंकि बिना फ्लैट के जीना कोई जीना है ? इसी बीच मुझे ख्याल आया, क्यों सरकार की आवास योजना का लाभ लिया जाए ? मगर यहां भी वही बंदरबाट का आलम देखकर मैं सोचने लगा कि यहां अपनी दाल गलने वाली नहीं है, क्योंकि ऐसे आवास पाने के लिए न तो हमारे पास बीपीएल का कार्ड है और न ही हम जेब गरम करने में समर्थ हैं। देखा जाए तो सरकार की आवास योजना में भी मालदार गरीबों का ही वर्चस्व है, क्योंकि गरीबों का हक मारने की परिपाटी अभी की थोड़ी न है। यह सिलसिला एक अरसे से चल रहा है, यह अचानक कैसे थम सकता है।

आदर्श सोसायटी में भी कुछ ऐसा ही हुआ, यहां भी गरीबों का हक मारने के लिए कहां-कहां से धनपशु टूट पड़े। शहीदों के फ्लैटों पर भी इस कदर टेढ़ी नजर रही कि उनके सम्मान का भी ख्याल नहीं रहा। इन बातों के ध्यान में आते ही मैं सोचने लगा कि मेरी हैसियत तो कौड़ी भर नहीं है। यहां कैसे फ्लैट का सपना पूरा हो पाएगा ? आखिर मन में आया कि जिस तरह औरों ने तिकड़मबाजी कर, फ्लैटों का जुगाड़ जमाया है, कुछ ऐसा ही कमाल करना पड़ेगा। यहां भी मैं ठिठककर रह गया, क्योंकि ऐसे जुगाड़ के लिए मेरी उंची पहुंच नहीं है। अंततः मैं अपने मन को मारकर अपने किराए के मकान के एक कोने में रम गया, क्योंकि फ्लैटों का आदर्श जुगाड़ कर पाना मेरी बस की बात नहीं है। ये तो उंचे लोगों की उंची कुर्सी के दंभी शुरूर से संभव हो सकता है, जिसके काबिल हम जैसे तुच्छ लोग कैसे हो सकते हैं ?

राजकुमार साहू
लेखक व्यंग्य लिखते हैं

जांजगीर, छत्तीसगढ़
मोबा - 098934-94714

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