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rajkumar sahu
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Rajkumar sahu's Blog

व्यंग्य - ‘ऐरे-गैरे’ की प्रतिक्रिया

एक बात तो है, जो ‘आम’ होता है, वही ‘खास’ होता है। अब देख लीजिए ‘आम’ को, वो फलों का ‘राजा’ है। नाम तो ‘आम’ है, मगर पहचान खास में होती है। हर ‘आम’ में ‘खास’ के गुण भी छिपे होते हैं। जो नाम वाला बनता है, एक समय उन जैसों का कोई नामलेवा नहीं होता। जैसे ही कोई उपलब्धि हासिल हुई नहीं कि ‘आम’ से बन जाते हैं, ‘खास’।

देख लीजिए, हमारे क्रिकेट के महारथी, कुल कैप्टन को। जब वे क्रिकेट की दहलीज पर कदम रखे तो उन्हें कोई नहीं जानता था, उनकी बस इतनी ही पहचान थी, जैसे वे आजकल बोले जा रहे हैं, ‘एैरे-गैरे’…

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Posted on December 20, 2012 at 2:53pm — 1 Comment

व्यंग्य - पानी रे पानी...

निश्चित ही पानी अनमोल है। यह बात पहले मुझे कागजों में ही अच्छी लगती थी, अब समझ भी आ रहा है। गर्मी में पानी, सोने से भी महंगा हो गया है, बाजार में दुकान पर जाने से ‘सोना’ मिल भी जाएगा, मगर ‘पानी’ कहीं गुम हो गया है। मेरे लिए तो फिलहाल सोने से भी ज्यादा कीमत, पानी की है, क्योंकि पानी को ढूंढने निकलता हूं तो दिन खप जाता है और वह गाना याद आता है...पानी रे पानी...तेरा रंग कैसा...। पानी के बिना वैसे तो जिंदगी ही अधूरी है और ऐसा लग भी रहा है, क्योंकि पानी ने जिंदगी से दूरी जो बना ली है। सुबह से…

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Posted on June 3, 2012 at 1:38pm — 8 Comments

लघुकथा - जीवन पथ

मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां एक नेत्रहीन व्यक्ति है। वे पूरे शहर में खुद ही एक डंडे के सहारे कहीं भी चले जाते हैं। उन्हें इस तरह ‘जीवन पथ’ पर आगे बढ़ते बरसों हो गया। उनकी जिजीविषा देखकर हर कोई हतप्रद रह जाता है। यह तो हम सब कहते रहते हैं कि बेसहारे को सहारे की जरूरत होती है, मगर यह नेत्रहीन व्यक्ति ऐसी सोच रखने वालों के लिए मिसाल है। दरअसल, पिछले दिनों नेत्रहीन व्यक्ति शहर के चौक से गुजर रहा था, इसी दौरान उन्हें सड़क किनारे से आवाज आई कि कोई उसे सड़क पार करा दे। इससे पहले कोई उस असहाय व्यक्ति को… Continue

Posted on December 6, 2011 at 12:17am — 2 Comments

महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार

केन्द्र में सत्ता पर बैठी कांग्रेसनीत यूपीए सरकार चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन महंगाई व भ्रष्टाचार के कारण सरकार जनता की अदालत में पूरी तरह कटघरे में खड़ी है। ठीक है, अभी लोकसभा चुनाव को ढाई से तीन साल शेष है, किन्तु सरकार को जनता विरोधी कार्य करने से बाज आना चाहिए। महंगाई ने तो पहले ही लोगों की कमर तोड़कर रख दी थी। फिर भी सरकार का रवैया नकारात्मक ही रहा और महंगाई की मार कम हो ही नहीं रही है। सरकार में बैठे सत्ता के मद में चूर कारिंदों के ऐसे बयान आते रहे, जिससे महंगाई नई उंचाईयां छूती…

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Posted on December 5, 2011 at 1:31am

Comment Wall (6 comments)

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At 7:00pm on July 10, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 8:34pm on February 2, 2011, Admin said…

कृपया नीचे दिया हुआ लिंक देखे और OBO परिवार के नियमों से परिचित हो ले | धन्यवाद |

http://www.openbooksonline.com/page/5170231:Page:12658

At 8:56am on October 30, 2010, Admin said…
आदरणीय राजकुमार साहू जी,
सादर अभिवादन,
आपका एक ब्लॉग "पहाड़ का सीना चीर, अनवरत बह रही धारा" तथा "छत्तीसगढ़ की काषी खरौद" अनुमोदन हेतु प्राप्त हुआ है, कृपया इसे "धार्मिक साहित्य" ग्रुप मे पोस्ट कर दे, सुविधा हेतु ग्रुप का लिंक नीचे दे रहा हूँ |
http://www.openbooksonline.com/group/dharmiksahitya
धन्यवाद,
आपका
एडमिन
OBO
At 9:33pm on October 17, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 6:29pm on October 13, 2010, Admin said…

At 1:58pm on October 13, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

 
 
 

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