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महकती ज़िन्दगी हो फिर शिकायत कौन करता है

बिना कारण ही मरने की हिमाकत कौन करता है

 

तुम्हारी  आँखों में सूखे हुए कुछ फूल देखे थे

तड़पकर माज़ी से इतनी मुहब्बत कौन करता है

 

बड़े काबिल हो तुम लेकिन तुम्हारी जेब है खाली,

भला ऐसों से भी यारा मुहब्बत कौन करता है|

 

कड़कती धूप भी सहते कभी बरसात ठंडी भी,

खुदा ऐसों पे तेरे बिन इनायत कौन करता है|

 

न पूजेगा कोई तुमको खुदा गर सामने आया ,

बिना डर और लालच के इवादत कौन करता है|

 

बने हैं बापू के बन्दर हमारे देशवासी सब,

हुकूमत के भला आगे बगावत कौन करता है|

 

शरीफों में मेरा भी नाम ‘मिंटू’ कर ले तू शामिल,

कि मैं भी तो जरा देखूं शराफत कौन करता है|

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 28, 2015 at 5:51pm

गिरिराज भंडारी साहेब जी .............. बहुत -बहुत शुक्रिया आपका|


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 27, 2015 at 7:13am

आदरणीय बैज नाथ भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ आपको ।

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 26, 2015 at 10:22pm

कांता जी ......... शुक्रिया| 

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 26, 2015 at 10:21pm

मनोज अहसास जी---- शुक्रिया| 

Comment by kanta roy on October 26, 2015 at 6:09pm

तुम्हारी आँखों में सूखे हुए कुछ फूल देखे थे
तड़पकर माज़ी से इतनी मुहब्बत कौन करता है----लाज़वाब शेर बन पड़ी है इस ग़ज़ल में सारे के सारे। बेहतरीन ,बधाई BAIJNATH SHARMA'MINTU' जी।

Comment by मनोज अहसास on October 25, 2015 at 8:57pm
आदरणीय बैजनाथ जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने
मंच की परम्परा है के ग़ज़ल के अर्कान सबसे ऊपर लिखे जाते है
जैसे इस ग़ज़ल के अर्कान 1222 1222 1222 1222 है
तो इन्हें सबसे ऊपर लिखे
मैं पहली रचना पर आपको बधाई देता हूँ
सादर

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