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मेरे महबूब के आमद का जलवा

बहर 1222/1222/1222/1222

मेरे महबूब की आमद का जलवा खूब सूरत है//
जहाँ में रंग है जितने वो उतना खूब सूरत है//

मजे की बात है यारों कोई तारा नही वैसा/
फलक पर आज का महताब जितना खूब सूरत है/1/

चलो अब चाँद तुम अपनी मुहब्बत की सुनाओ कुछ/
सुना है चादनी मांझी का रिश्ता खूब सूरत है /2/

कोई हिंदी में लिखता है , कोई उर्दू में लिखता है/
लिखा जो भी गया है वो तराना खूब सूरत है/3/


कभी तुमसे गिरा था जो बरेली की बजारोमे /
तेरी वो कान की बाली वो झुमका खूब सूरत है/4/

सरारत की जो नुक्कड़ में मुहब्बत थी मेरी साथी/
तुझे कोने में यु मिलना सताना खूब सूरत है/5/


ये पुरी रात है जागा तेरे घर की हिफाजत में/
मेरे साथी तेरे घर का ये कुत्ता खूब सूरत है/6/

न मजहब की सुनाओ तुम न चर्चा जाति का रक्खो/
चलो किस्तों में निपटा दे ये तुक्का खूब सूरत है/7/

मुहब्बत के वसूलों पर गजल तुम रोज लिखती हो/
अरे छोडो भी अब साकी ये चिमटा खूब सूरत है/8/

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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Comment

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 6:44pm
आ कांता दीदी जी और मनोज भाई साहब स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए आभार नमन
Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 8:58am
कोई हिंदी में लिखता है , कोई उर्दू में लिखता है/
लिखा जो भी गया है वो तराना खूब सूरत है------- बेहतरीन गजल बनी है यह आपकी आदरणीय अमोद जी । शेर दर शेर लाजवाब बने हैै । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by मनोज अहसास on February 22, 2016 at 4:38pm
प्रस्तुति के लिए बहुत शुभकामनायें
सादर

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