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तुम्ही से ये सारा बसर देखते हैं

बहर 122/122/122/122

निगाहे नशा बेख़बर देखते है।
तुम्हे आज कल आँख भर देखते है।।

तुम्हारी अदा से जिधर देखते है।
मुहब्बत का अपने नगर देखते है।।

रूमानी है आबो हवा यार तेरी।
भरी बज्म में भी हुनर देखते है।।

जो सीखें हैं पेंचों के हमने करीने।
चलो आज उनका असर देखते है।।

तुम्ही गांव हो और* गालियाँ हमारी।।
तुम्ही से ये सारा बसर देखते है।।
मौलिक ,अप्रकाशित

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Comment by Rahul Dangi Panchal on March 13, 2016 at 9:50pm
अच्छा प्रसास भैया जी बधाई
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 12, 2016 at 7:21pm

क्या बात है क्या बात है आदरणीय बहुत खूब

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 12, 2016 at 4:27pm

आ० आमोद भाई जी, इसमे भी वही रदीफ/व्याकरण की गलती ...? आप अपनी गज़ल की रदीफ सही कर लें. जैसे...
तुम्हारी अदा को जिधर देखता हूं।।
मुहब्बत का अपना नगर देखता हूं।।
........................................अब मुझे सही लग रहा है.....प्रयास के लिये शुभकामनाएं. सादर

Comment by रामबली गुप्ता on March 12, 2016 at 4:24pm
केवल जी से सहमत हूँ
रचना अच्छी है।
बाकी सब शुभ शुभ

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