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बिटिया को अपने अगर देखते हैं

बह्र- 122-122-122-122
बिटिया को अपनी अगर देखते है।।
खुदा का करम अपने घर देखते है।।

वो नीली परी है खिलौना है घर का।
उसे जब भी देखूँ समर देखते है।।

जो सज धज के बेटी की डोली उठी तो।
पड़ोसी भी भर के नजर देखते है।।

अभी तक पिता की दुआ का असर था।
ये बेटे तो अक्सर ही जर देखते है।।

वो पुरखों ने सींचा कभी प्यार से जो।
वही आज सूखा शजर देखते हैं।।

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

Views: 373

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 27, 2016 at 4:00pm
आ राम बली सर आ केवल प्रसाद सर आप को नमन
मैं आप की राय को ध्यान दूंगा
Comment by रामबली गुप्ता on March 12, 2016 at 4:29pm
आ.केवल जी से सहमत हूँ
रचना में गहरा भाव निहित है। बधाई स्वीकार करें।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 12, 2016 at 4:11pm

आ० आमोद भाई जी,  यहां बड़े-बड़े गज़लकार हैं किंतु....?  आप अपनी गज़ल की रदीफ सही कर लें. जैसे...

बिटिया को अपनी अगर देखता हूं।।
खुदा का करम अपना घर देखता हूं।।......अब मुझे सही लग रहा है.....प्रयास के लिये शुभकामनाएं.  सादर

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