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चेहरा तेरा चाँद का टुकड़ा

चेहरा तेरा चाँद का  टुकड़ा
भौहें तनी कमान हैं क्या
इन आँखों में मैं मर जाऊँ
होंठों का तिल शान है क्या..2

तेरे तन की ख़ुशबू लेकर
फूल चमन में खिलते हैं
शायर तेरे हुशनो जवाँ की
दिल में किताबें लिखते हैं
उठी नज़र फिर झुक जाए तो
ढल जाती ये शाम है क्या
इन आँखों पे ...

तेरे लबों की बात करूँ तो
खिले कमल शर्माते हैं
तेरे क़दम जो पड़े जमी पे
शहंशाह झुक जाते हैं
तेरा खनकता स्वर गूंजा या
वीना की कोई तार है क्या
इन आँखो...

दिल मेरा मुझसे कहता है
क्यू तुझपे ही मरता है
शाम सहर बस तेरी बातें
तेरी इबाबत करता है
कियूँ तेरे सपने आते है
दिल भी हुवा बेईमान  है क्या
इन आँखों ...

अमित आज़ाद

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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