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हमारे पीछे तुम आयीं, तुम्हारे पीछे हम भागे।
न बोलूं मैं तेरे आगे, न बोलो तुम मेरे आगे।
जुबां खामोश है लेकिन, निगाहें बोल देती हैं।
हम भी रात भर रोये, तुम भी रात भर जागे।

हम भी मुस्कुराते हैं, तुम भी मुस्कुराते हो।
सबसे हम बताते हैं, सबसे तुम बताते हो।
लगा ये रोग कैसा है, हमारे दिल को ऐ जाना।
तुमसे हम छुपाते हैं, हमसे तुम छुपाते हो।

तुम्हारी भावनाओं को, समझता हूं मगर चुप हूं।
सदा खामोश लब की मैं, सुनता हूं मगर चुप हूं।
इशारों ही इशारों में, जो भेजा खत हमें तुमने।
निमंत्रण तेरी आंखों का, पढ़ता हूं मगर चुप हूं।

हमारी वेदनाओं को, नहीं तुम जान पाओगो।
कहेगो अश्क को पानी, हंसोगे टाल जाओगे।
हुआ बेदर्द हाकिम जब, सुनायें दर्द हम किसको।
हमारी कब्र पर आकर, सभी कुछ जान जाओगे।

हम से लोग कहते हैं, जो मन में है बयां कर दूं।
लूटा है मुझे किसने, मैं चोरी ये अयां कर दूं।
दिल की बात दिल में ही रहे, होगा यही बेहतर।
उठेंगी आग की लपटे, जो शोले को हवा कर दूं।

मगन अपनी वो महफिल में, इधर आंसू बहाता हूं।
लगा जो चोट इस दिल को, उसे हंसकर छुपाता हूं।
सुना है मेरी गीतों पर, बहुत वो दाद देतें हैं।
उन्हें मालूम ना शायद, कि नगमे दर्द गाता हूं।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 24, 2017 at 6:14pm
आदरणीय आरिफ सर! नमस्कार,
मुक्तक की सराहना और मेरा उत्साहवर्ध्दन के लिये आपका हार्दिक आभार।
सर! यह कुमार विश्वास जी की कविता- "कोई दीवाना कहता है" के लय में है। मात्रा- संयोजन मैंने नहीं किया है।
क्षमा सहित।
Comment by Mohammed Arif on February 22, 2017 at 5:26pm
आदरणीय विन्ध्येश्वरी जी आदाब, बहुत बेहतरीन मुक्तक । सशक्त भावाभिव्यक्ति । एक बात कहना चाहूँगा कि आपने मात्रा संयोजन क्या रखा नहीं लिखा है । बधाई स्वीकार करें ।

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