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मुखौटों की दुनिया

मुखौटों की दुनिया
मुखौटों की दुनिया मे रहता है आदमी,
मुखौटों पर मुखौटें लगता है आदमी |
बार बार बदलकर देखता है मुखौटा,
फिर नया मुखौटा लगता है आदमी |
मुखौटों के खेल मे माहिर है आदमी,
गिरगिट को भी रंग दिखाता है आदमी |
शैतान भी लगाकर इंसानियत का मुखौटा,
आदमी को छलने को तैयार है आदमी |
मजहब के ठेकेदार भी अब लगाते है मुखौटे,
देते हैं पैगाम, बस मरता है आदमी |
लगाने लगे मुखौटे, जब देश के नेता,
मुखौटों के जाल मे, फँस गया आदमी |
जाति, धर्म का जब लगाया मुखौटा,
आदमी का दुश्मन, बन गया है आदमी |
देखकर नेताओं का मुखौटा अनोखा,
हैरान और परेशान रह गया है आदमी |
कभी भूल जाता है मुखौटा बदलना आदमी,
शै और मात मे फंस जाता है आदमी |
मुखौटों के खेल मे इतना उलझ गया आदमी,
खुद की ही पहचान भूल गया है आदमी |



डा. ए. कीर्तिवर्द्धन अग्रवाल

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 19, 2011 at 8:06pm

मुखौटों के खेल मे इतना उलझ गया आदमी,
खुद की ही पहचान भूल गया है आदमी |

 

वाह वाह , बहुत खूब आदरणीय डा. ए. कीर्तिवर्द्धन अग्रवाल  जी , जबरदस्त रचना है , इस आदमी नामक जीव के पास इतने चेहरे है कि पहचानना मुश्किल है , कब कौन सा मुखौटा धारण कर ले कहना मुश्किल,

इस बेहतरीन रचना हेतु बहुत बहुत बधाई स्वीकार करे आदरणीय |

 

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