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1222     1222      122

जमाने भर की बातें सोचता हूँ
मगर मैं खुद में अब कितना बचा हूँ

सुहानी भोर किस्मत में नहीं है
भला मैं रात भर क्यों जागता हूँ

मुहब्बत एक हरजाई का घर है
मैं उस घर से निकाला जा चुका हूँ

तरफदारी से तेरी क्या है हासिल
मैं अपनों में अकेला पड़ गया हूँ

गुजारी जिंदगी सारी जहाँ पर
मैं अब उस शहर में बिल्कुल नया हूँ

तुझे आवाज देने का सबब है
मैं अब तन्हाई से डरने लगा हूँ

तरक्की कर रही है सारी दुनिया
मैं अपनी हार पर पछता रहा हूँ

किसी की मद भरी आंखों के फन से
कदम रखता हूं गिरता कांपता हूँ

शिकारी आ गए हैं देख सारे
गजाला की सदा में चीखता हूँ

मुझे कितनी समझ है जिंदगी की
मैं अपने शेर पढ़कर सोचता हूँ

जमाने को शिकायत हो गई है
मैं बच्चों को फरिश्ता कह रहा हूँ

तुम्हारे खत के टुकड़े हाथ में हैं
मैं बीते कल को फिर से जोड़ता हूँ

नहीं है इस ग़ज़ल का छोर कोई
मुसलसल शेर कितने कह गया हूं

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by मनोज अहसास on October 16, 2019 at 7:19pm

इस जानकारी के लिए बेहद शुक्रिया सर

मैं इस शेर पर पुनः विचार करता हूँ

सादर

Comment by Samar kabeer on October 16, 2019 at 7:13pm

"ग़ज़ाला" का अर्थ है हिरन का मादा बच्चा ।

और "ग़ज़ाल" का अर्थ है हिरन का बच्चा ।

Comment by मनोज अहसास on October 14, 2019 at 11:29pm

आदरणीय समर कबीर साहब,नमस्कार

सर मैंने इस शब्द को हिरण के बच्चे के अर्थ में प्रयोग किया है बाकी आप मार्गदर्शन देने की कृपा करें

हार्दिक आभार

सादर

Comment by Samar kabeer on October 14, 2019 at 2:48pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'शिकारी आ गए हैं देख सारे 
गजाला की सदा में चीखता हूँ'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं है, 'गजाला' का अर्थ क्या है?

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