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कविता(मुक्तछंद) - डटे रहो

डटे रहो तुम अपने पथ पर,

इक दिन दुनिया ये डोलेगी ।

जल,थल और आकाश में जनता,

तेरी ही बोली बोलेगी ।।

कभी डरो ना असफलता से,

स्वाद तुम्हें जो जीत का चखना ।

व्यंग्य करें कितने ही दुनिया, 

खुद पर विश्वास बनाए रखना ।।

नाम मिला उनका मिट्टी में,

जो हैं बस ख्वाबों में जीते ।

कर्मभूमि पर रहने वाले,

विजय का मृत हैं पीते ।।

बिन संघर्ष यहां सफलता, 

नहीं कभी कोई पा पाया ।

उनका ही निखरा है जीवन,

जिसने खुद को है तपाया ।

चलो उठो अब कर्म करो तुम, 

ख्वाबों की दुनिया से निकलो ।

लक्ष्य बना लो सपनों को तुम, 

उनको पाकर ही अब दम लो ।।

घोर निराशा आने पर भी,

सदा जीत की आस रखो ।

सफल तुम्हें निश्चित ही होना,

हरदम यह विश्वास रखो ।।

इक दिन तेरी खुशबू से,

सारी दुनिया ये महकेगी ।

कामयाबी खुद आगे बढ़कर,तेरे कदमों को चूमेगी ।।

कामयाबी खुद आगे बढ़कर,तेरे कदमों को चूमेगी ।।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on October 14, 2019 at 3:00pm

जनाब प्रशांत दीक्षित 'सागर' जी आदाब, अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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