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बचपन.

बचपन इतना मीठा जैसे हो कोई चाकलेट.
महँगी-सस्ती,लम्बी-छोटी,चाहे जो हो रेट
चाहे जो हो रेट,लगे है बस मनभावन.
याद करें इसकी तो मुह में आये सावन.
कहता है अविनाश,सुनो उनका भी क्रंदन!!
ख़त्म हो रहा चौराहों पे जिनका बचपन.
अविनाश बागडे.

 

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Comment by आशीष यादव on November 17, 2011 at 7:34pm

aadarniya shri avinash vagde ji, bachpan ke upar aapki ye atisundar kundaliya padhkar bahut achchha lga.

badhai


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 15, 2011 at 6:40pm

खुबसूरत और मननीय कुण्डलिया, बधाई |

Comment by AVINASH S BAGDE on November 15, 2011 at 10:59am

Aabhar Arun'abhinav'ji aapki in housalo se bhari bato ka.

Comment by Abhinav Arun on November 15, 2011 at 7:48am
कहता है अविनाश,सुनो उनका भी क्रंदन!!
ख़त्म हो रहा चौराहों पे जिनका बचपन.
 
इस अच्छी सोच को नमन है अविनाश जी हार्दिक बधाई हम सब के भीतर छुपे बचपन को !!

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