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                                   ग़ज़ल

छोटे  से  दिल  में  दुनिया  का,   दर्द   छुपाये  फिरता  हूँ |
आंसू  के   फूलों  से   अपनी,   लाश   सजाए   फिरता  हूँ ||


अपना  बनकर  दिल  को  लूटना,  है  दस्तूर ज़माने का,
मैं  ऐसे  ही  कुछ  रिश्तों  पे,  खुद  को  लुटाये फिरता हूँ ||


ख्वाब है केवल, अफसाना है, इश्क, मोहब्बत और वफ़ा,
अपने  दिल  के  अरमानों  की,  खाक  उठाये  फिरता हूँ ||


दुनिया  में  आकर  सोचा  था- खुशियों के सागर खोजूं ,
लेकिन  ऐसे  ज़ख्म मिले हैं , दिल को दवाये फिरता हूँ ||


बनकर   इन्सां  ये  चाहा  था-  मेरी   हस्ती   चाँद  बने ,
आज उसी अरमां की लौ से,  दिल को जलाये फिरता हूँ || 


दर्द  बना   है   जीवन   मेरा,   खुद  पे  मैं  शमिन्दा  हूँ ,
गम के एक क़ातिल तूफां को दिल से लगाये फिरता हूँ ||

                                    रचनाकार - अभय दीपराज

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Comment by Abhinav Arun on March 10, 2011 at 9:59am
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