For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हम जिंदगी से क्या चाहते हैं
-----------------------
हम खुद नहीं जानते
हम जिंदगी से क्या चाहते हैं
कुछ कर गुजरने की चाहत मन में लिए
अधूरी चाहतों में जिए जाते हैं

उभरती हैं जब मन में
लीक से हटकर ,कुछ कर गुजरने की चाह
संस्कारों की लोरी दे कर
उस चाहत को सुलाए जाते हैं

सुनहली धुप से भरा आसमान सामने हैं
मन के बंद अँधेरे कमरे में सिमटे जाते हैं

चाहते हैं ज़िन्दगी में सागर सा विस्तार
हकीकत में कूप दादुर सा जिए जाते हैं

चाहते हैं ज़िन्दगी में दरिया सी रवानी
और अश्क आँखों में जज़्ब किये जाते हैं

चाहते हैं जीत लें ज़िन्दगी की दौढ़
और बैसाखियों के सहारे चले जाते हैं

कुछ कर गुजरने की चाहत
कुछ न कर पाने की कसक
अजीब कशमकश में
ज़िंदगी जिए जाते हैं

हम खुद नहीं जानते
हम ज़िन्दगी से क्या चाहते हैं

Views: 461

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Raju on April 16, 2010 at 4:29pm
Rajni Didi Pranaam ...

Aapki ye kavita bahut hi achhi hai ... hum sab ko aapki aur v rachnao ka intezaar rahega
Comment by BIJAY PATHAK on April 14, 2010 at 1:45pm
Adarniya Rajni ji,
Jiwan ki sachai ko itne sunder kavita ke madhyam se likhne ke liye dhanyabad,
कुछ कर गुजरने की चाहत
कुछ न कर पाने की कसक
अजीब कशमकश में
ज़िंदगी जिए जाते हैं
Bahut khub
Comment by amit on April 12, 2010 at 8:56pm
ye bahut hi achi rachna hai aur isme jivan ki sachi bat batayi gayi hai
Comment by Sanjay Kumar Singh on April 11, 2010 at 5:18pm
Bahut badhiya rachna hai, jindgi ki sachaai,aur anubhaw ka samawesh ees kavita mey dikhta hai, Sundar ban padaa hai,
Comment by Admin on April 11, 2010 at 2:48pm
चाहते हैं ज़िन्दगी में सागर सा विस्तार
हकीकत में कूप दादुर सा जिए जाते हैं


आदरणीया रजनी जी ,प्रणाम ,सर्वप्रथम मै आपको प्रथम ब्लॉग ओपन बुक्स पर लिखने के लिये धन्यबाद देता हू, आपने बहुत ही अच्छी कविता लिखा है, ये सही है की अगर आप समंदर को अपने अन्दर छुपा लेना चाहते है तो आपका ह्रदय भी समुन्दर सा विशाल होना चाहिये , सपना देखना अच्छी बात है किन्तु उस सपना को पूरा करने हेतु प्रयत्न भी करना चाहिये,इस कविता का एक एक लाइन ज्ञानवर्धक और संदेशो से भरा हुआ है, बहुत अच्छी रचना,
आपके अगले ब्लॉग के इंतजार मे
Admin
OBO

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 11, 2010 at 1:33pm
उभरती हैं जब मन में
लीक से हटकर ,कुछ कर गुजरने की चाह
संस्कारों की लोरी दे कर
उस चाहत को सुलाए जाते हैं

रजनी दीदी सबसे पहले तो आपके द्वारा लिखे गये इस साईट पर पहले ब्लॉग के लिये आपको बहुत बहुत धन्यबाद, आप की कविता का एक एक लाइन बिलकुल यथार्थ से जुडे हुवे है, अगर परंपरा से हट कर कोई काम, कोई ब्यवसाय अगर करने की कोशिश किया जाता है तो रुढ़िवादी शक्तिया बराबर बिरोध करती रहती है, पर संघर्ष का नाम ही तो जिन्दगी है, जो लोग इन शक्तियों का सामना किया और इनसे नहीं डरा वो ही कुछ करते है और आगे बढते है, कहा गया है न की डर के आगे जीत है,
दीदी आपने बहुत ही खुबसूरत और अर्थ से परिपूर्ण रचना लिखा है, बहुत बढ़िया, आप के अगले पोस्ट का बेसब्री से इन्तजार रहेगा,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on April 11, 2010 at 1:08pm
bahut badhiya rachna hai rajni didi.....
कुछ कर गुजरने की चाहत
कुछ न कर पाने की कसक
अजीब कशमकश में
ज़िंदगी जिए जाते हैं
dhanybaad didi yahan humlogo ke beech itni acchhi rachna post karne ke liye........
aapke aur bhi rachnaon ka intezaar rahega...

preetam tiwary

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Wednesday
Admin posted discussions
Tuesday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
Tuesday
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
Tuesday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Jan 10
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Jan 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service