बेटी को बेटी रखो, करके इतना पुष्ट
भीतर पौरुष देखकर, डर जाये हर दुष्ट।१।
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बेटा बेटा कह नहीं, बेटी ही नित बोल
बेटा कहके कर नहीं, कम बेटी का मोल।२।
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करती दो घर एक है, बेटी पीहर छोड़
कहे पराई पर उसे, जग की रीत निगोड़।३।
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कर मत कच्ची नींव पर, बेटी का निर्माण
होता नहीं समाज का, ऐसे जग में त्राण।४।
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बेटी को मत दीजिए, अबला है की सीख
कर्म उसी के गेह से, रहे चाँद तक चीख।५।
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बेटों को भी दीजिए, कुछ ऐसे सँस्कार
बेटी के सम्मान का, वो सीखें आचार।६।
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हर बेटी श्रद्धेय है, इसे बनाओ रीत
भूले हैं ये इसलिए, रहे दुशासन जीत।७।
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अधरों पर हो अब नहीं, भूले भी ये बात
बेटी के सम्मान का, दिन भी काली रात।८।
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नहीं दुशासन सुत बने, और नहीं लंकेश
सिर्फ गजानन हो तभी, भला नार को देश।९।
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नुचे न देह बलात ये, हरण न हो अब चीर
हर बेटी को बोल दो, बन काली रणधीर।१०।
***
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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