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आदरणीय साथियो,

सादर नमन।
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"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-119 में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-119
विषय : प्रतीक्षा
अवधि : 27-02-2025 से 28-02-2025
.
अति आवश्यक सूचना:-
1. सदस्यगण आयोजन अवधि के दौरान अपनी केवल एक लघुकथा पोस्ट कर सकते हैं।
2. रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना/ टिप्पणियाँ केवल देवनागरी फॉण्ट में टाइप कर, लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड/नॉन इटेलिक टेक्स्ट में ही पोस्ट करें।
3. टिप्पणियाँ केवल "रनिंग टेक्स्ट" में ही लिखें, 10-15 शब्द की टिप्पणी को 3-4 पंक्तियों में विभक्त न करें। ऐसा करने से आयोजन के पन्नों की संख्या अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है तथा "पेज जम्पिंग" की समस्या आ जाती है। 
4. एक-दो शब्द की चलताऊ टिप्पणी देने से गुरेज़ करें। ऐसी हल्की टिप्पणी मंच और रचनाकार का अपमान मानी जाती है।आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है, किन्तु बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पाए इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है। देखा गया कि कई साथी अपनी रचना पोस्ट करने के बाद गायब हो जाते हैं, या केवल अपनी रचना के आस पास ही मंडराते रहते हैंI कुछेक साथी दूसरों की रचना पर टिप्पणी करना तो दूर वे अपनी रचना पर आई टिप्पणियों तक की पावती देने तक से गुरेज़ करते हैंI ऐसा रवैया कतई ठीक नहींI यह रचनाकार के साथ-साथ टिप्पणीकर्ता का भी अपमान हैI
5. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति तथा गलत थ्रेड में पोस्ट हुई रचना/टिप्पणी को बिना कोई कारण बताये हटाया जा सकता है। यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
6. रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका, अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल/स्माइली आदि लिखने/लगाने की आवश्यकता नहीं है।
7. प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार "मौलिक व अप्रकाशित" अवश्य लिखें।
8. आयोजन से दौरान रचना में संशोधन हेतु कोई अनुरोध स्वीकार्य न होगा। रचनाओं का संकलन आने के बाद ही संशोधन हेतु अनुरोध करें। 
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यदि आप किसी कारणवश अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सकें है तो www.openbooksonline.com पर जाकर प्रथम बार sign up कर लें.
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मंच संचालक
योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)

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स्वागतम

प्रवृत्तियॉं (लघुकथा):
"इससे पहले कि ये मुझे मार डालें, मुझे अपने पास बुला लो!" एक युवा बहू की प्रार्थना थी।
"मैं इतने सारे ऑपरेशन कैसे बर्दाश्त कर पाऊंगी। मुझे यहां से आज़ाद कर दो" बलात्कार पीड़िता पॉंच वर्षीय बच्ची की आत्मा चीख उठी।
"बोर्ड परीक्षा के दरमियाॅं भी मेरी ऐसी परीक्षा! मुझे अपने पास बुला लो या फ़िर मैं भी ख़ुदक़ुशी कर डालूॅं!" इम्तेहान देकर अपने छात्रावास की ओर लौटते समय कक्षा दसवीं की एक यौन पीड़ित छात्रा की आत्मा भीतर से चीखी।
"दुनिया के सारे सुख भोग लिए धन-दौलत और ऐश्वर्य से। अब यह बीमारी चैन से जीने नहीं देती। मुझे उठा ले अब!" करोड़पति आइसीयू में पल-पल दिल ही दिल में बोल रहा था।
"बुरी सेहत और कंगाली में कुॅंवारी बेटियों का बोझ नहीं उठा सकता अब। मरना चाहता हूॅं अब!" बेरोज़गार बाप छाती पीट कर बुदबुदा रहा था।
आख़िर ईश्वर का दिल पिघल ही गया। दुर्व्यवहार, दुराचार, दुर्घटनाओं, आपदाओं, त्रासदियों और ना-ना प्रकार की शारीरिक और मानसिक प्रतारणाओं रूपी परीक्षाओं में हारने वाले पीड़ित मनुष्यों की प्रार्थनाओं को अनुमोदित कर ईश्वर ने मनुष्य को 'इच्छा मृत्यु' का वरदान दे ही दिया।
नन्हे-मुन्ने बच्चों से लेकर वृद्ध मनुष्यों तक ने वरदान का लाभ उठा कर स्वेच्छिक मृत्यु को गले लगाना शुरू कर दिया;  यह चलन पहले तीव्र गति से चला, फ़िर धीमी गति से और फिर गतिरोध शुरू हो गया और फ़िर इच्छा मृत्यु चाहने वालों की संख्या शून्य हो गई। 
"इच्छा मृत्यु ... वरदान या अभिशाप? मनुष्य बेपेंदी का लोटा या स्वार्थी!" ईश्वर स्वयं के निर्णयों में उलझ गया। अब वह नये-नये तरीक़ों से मनुष्य की परीक्षाएं लेने लगा और उसकी नयी प्रार्थनाओं का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा।
(मौलिक व अप्रकाशित)
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी साहब जी , इस प्रयोगात्मक लघुकथा से इस गोष्ठी के शुभारंभ हेतु हार्दिक बधाई। आपका प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। विषय भी नया और समयानुकूल है।लेकिन मुझे इस प्रस्तुति ने बहुत निराश किया। आपकी लेखनी से जिस स्तर की जिज्ञासा और उम्मीद रहती है, वह कहीं भी नज़र नहीं आई। कुछ व्याकरण की त्रुटियाँ भी मजा बिगाड़ने में अपना पूर्ण योगदान दे रही हैं। कुल मिला कर इस लघुकथा में पाठक की आशाओं पर आप खरे नहीं उतरे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मेरी इस टिप्पणी को एक सच्चे मित्र के परामर्श के रूप में स्वस्थ मन से स्वीकार करेंगे। सादर।

रचना पटल पर उपस्थिति और विस्तृत समीक्षात्मक मार्गदर्शक टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय तेजवीर सिंह जी। आपको पाठकीय निराशा हुई, इसका मुझे खेद है। भविष्य में ध्यान रखूंगा। लेकिन आपने वे शब्द या पंक्तियॉं इंगित नहीं कहीं, जहां आपको वैसी खामियॉं लगीं। मैंने रचना को पुनः पढ़ कर देखा है। मैं नहीं ढूंढ़ पा रहा। कृपया आप इंगित कर सहयोग कीजिए या अन्य सहभागी साथी या एडमिन महोदय सर जी। सादर निवेदन।

जिजीविषा
गंगाधर बाबू के रिटायर हुए कोई लंबा अरसा नहीं गुजरा था।यही दो -ढाई साल पहले सचिवालय की नौकरी से छुट्टी मिली थी।भरा -पूरा परिवार था।बीवी पुजारिन थी, बहुएं फैशनपरस्त।बेटे अपनी घर -गिरस्ती मग्न। पोते -पोतियां कुछ साथ निभाते।बाकी समय वे समाज -सेवा के नाम पर गली -मुहल्ले की सफाई पर लोगों से मशविरा करने या गलियों में श्वान -शौच करानेवालों से उलझने में निकालते।'सच कहां सिरमौर हुआ?' की उक्ति चरितार्थ होती।प्रायः उनके उलाहने आने लगे। कहां वे नौकरी काल में शिकायतें सुना करते? उनपर निर्णय सुनाते। विभाग की इथिक्स कमेटी के चेयरमैन की हैसियत थी उनकी।कहां आज वे खुद कठघरे में खड़े किए जाने लगे। नतीजतन, घर में ताने मिलने शुरू हो गए।बेटे,बहुओं की बातों को तो उन्होंने ताक पर रखी।पर,पत्नी की बेरुखी असह्य लगी।घर से निकल गए।
गंगा - यमुना सबके तटों पर रमे।जल में डुबकी लगाई।पर ठिकाना बनाया मुहल्ले के नामी वृद्धाश्रम को। वहीं सफाई,शुचिता,सेहत,नैतिकता जैसे उच्च भाववाले शब्दों को व्यवहार में उतारने की वकालत करते।खुद उनका आचरण  वैसा ही था भी। सोचकर निकले थे कि अब किसी परिवार -जन से कोई लगाव न रखूंगा। पर,हर शाम काउंटर पर जाकर  आगंतुकों की सूची जरूर जांचते।कहीं घर का कोई उन्हें तलाशते हुए आकर लौट न गया हो,यही सोचा करते।

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

बढ़िया शीर्षक सहित बढ़िया रचना विषयांतर्गत। हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। 'घर-गृहस्थी' शायद ग़लत टंकित हो गया है।

आपका हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी।नमन।।

सादर नमस्कार आदरणीय।  रचनाओं पर आपकी टिप्पणियों की भी प्रतीक्षा है।

आदरणीय मनन कुमार सिंह जी, हार्दिक बधाई । उच्च पद से सेवा निवृत एक वरिष्ठ नागरिक की शेष जिंदगी की ऊहापोह का वर्णन बहुत मार्मिक एवं सटीक भाषा शैली द्वारा लघुकथा की जो रूपरेखा आपने रची है, वह निश्चय ही हृदय को प्रभावित करती है।वैसे भी आम तौर पर समाज में सभी वरिष्ठ जनों को वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जिसके कि वे वास्तव में हक़दार होते हैं। आपका प्रयास उत्तम है। सादर।

आपका हार्दिक आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी।नमन।।

कुंभ मेला - लघुकथा -

“दादाजी, मैं थक गया। अब मेरे से नहीं चला जा रहा। थोड़ी देर कहीं बैठ लो। थोड़ा सुस्ता लो।”

"पप्पू, मैंने तुझे कितना समझाया था कि यह बच्चों का मेला नहीं है पर तू मेला नाम सुनते ही पीछे पड़ गया। बेटा यहाँ तो कहीं सुस्ताने को जगह भी नहीं है।जिधर देखो उधर ही जमघट लग रहा है।”

दादा और दादी कुंभ स्नान करने जा रहे थे। यह बात जैसे ही उनके आठ वर्षीय नाती पप्पू ने सुनी। वह मचल गया। पूरे परिवार की दलीलें उसे समझाने में नाकाम साबित हुईं। अब वह दादा और दादी के लिए एक समस्या बनता जा रहा था। कुछ जानकारों से पता चला कि गंगा मैया अभी छह किलो मीटर दूर है। प्रशासन ने रेल गाड़ियों पर अधिक भीड़ के चलते प्रयाग राज (संगम) रेलवे स्टेशन को कुछ दिन के लिये बंद कर दिया था। अतः अधिकांश यात्री नैनी स्टेशन पर उतर रहे थे। वहाँ से बुजुर्ग और बच्चों को लंबी पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। दादा और दादी के पास अपने अपने सामान के थैले थे। इसलिये वे पप्पू को गोद में लेने में असमर्थ थे।
"दादाजी, मुझे प्यास लग रही है।"
दादाजी ने थैले से पानी की बोतल निकाली। लेकिन वह खाली हो चुकी थी। थोड़ा आगे जाकर एक दुकान से पानी की बोतल माँगी।उसने बीस रुपये की बोतल के तीन सौ रुपये लिये। दादाजी की मिन्नतों का उस पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे दुकानदार ने दादाजी को ही ज्ञान दे दिया कि कुंभ में पुन्य कमाने आये हो तो पैसे का मोह मत करो।
जैसे तैसे दो किलो मीटर और आगे आये लेकिन तब तक पप्पू बेहद निढाल हो चला था। उसकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। दादा जी अजीब मुश्किल में थे।
थोड़ा आगे निकलने पर एक ढाबा जैसा दिखा जिस पर कुछ चारपाई बिछी थीं। दादा और दादी सुस्ताने और कुछ खाने के इरादे से एक चारपाई पर बैठ गये। पप्पू थकान से लेट गया और तुरंत सो गया। अब एक और समस्या खड़ी हो गई। दादाजी बड़े असमंजस में थे।
उन्होंने हिम्मत करके ढाबे वाले से निवेदन किया , "हम लोग गंगा स्नान करके आते हैं। तब तक इस बच्चे को यहाँ सोने दें।" बहुत ना नुकर के बाद वह दुकानदार मान गया। लेकिन जल्दी आने की चेतावनी भी दे डाली।
बेचारे दोनों बुजुर्ग जैसे तैसे भीड़ के धक्के खाते हुए गंगा स्नान तो कर लिए लेकिन जब ढाबे पर पहुंचे तो कलेजा मुँह को आ गया। क्योंकि पप्पू वहाँ नहीं मिला।
ढाबे वाले ने बताया कि बच्चा जागते ही दादाजी दादाजी कह कर रोते हुए भाग गया। मेरा आदमी पीछे भागा लेकिन भीड़ इतनी अधिक थी कि वह गुम हो गया।
अब आप मेरे आदमी के साथ जाकर गुमशुदा केंद्र में शिकायत दर्ज करा दो।
"लेकिन वह बच्चा तो कुछ भी बताने में असमर्थ है।”
“अब जो भी हो बाबा जी। आपके पास यही एक विकल्प है। इंतज़ार कीजिये| गंगा मैया सब भली करेगी।"

मौलिक एवं अप्रकाशित

बहुत ही भावपूर्ण रचना। शृद्धा के मेले में अबोध की लीला और वृद्धजन की पीड़ा। मेले में अवसरवादी व्यापार। बीस रुपए की पानी की बोतल की मनमानी क़ीमत और आपाधापी में ढाबे वाले की लापरवाही। विशाल मेलों में यह सब होता है। शृद्धा और आस्था के मेले में गंगा मैया ही बच्चे की रक्षा कर परिवार तक पहुंचायेंगी। यह भी एक आस्था और विश्वास है। व्यवस्था अपनी जगह है और नागरिक दायित्व अपनी जगह और दुकानदारों और ढाबे वालों का सहयोगात्मक रवैया या उपेक्षित रवैया अपनी जगह। कुल मिलाकर विडम्बनाएं ही हैं। हार्दिक बधाई आदरणीय तेजवीर सिंह जी इस मार्मिक रचना हेतु। विवरण कहानीनुमा हो गया सब कुछ बयाॅं करने से। शीर्षक कोई बढ़िया चुनना होगा। विवरण कहानीनुमा हो गया सब कुछ बयाॅं करने से

शीर्षक सुझाव: विकल्प/ अबोध का मेला/अबोध/ गंगा मैया खेवैया आदि 

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