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यक्ष का संदेश (मेघदूत के काव्यानुवाद ) पर डा. नलिनरंजन सिंह का वक्तव्य    ::   प्रस्तुति -गोपाल नारायण श्रीवास्तव

दिनांक  23 जून 2019  

‘ डॉ.. गोपाल नारायण श्रीवास्ताव कृत यक्ष का संदेश (मेघदूत के काव्यानुवाद) का पाठ करते हुए  मुझे याद आया कि अपने विद्यार्थी जीवन में मैंने नागार्जुन की कविता ‘कालिदास सच-सच बतलाना’ पढ़ी थी I कविता के अंत में नागार्जुन कहते हैं -

पर पीड़ा से पूर-पूर हो

थक-थककर और चूर-चूर हो

अमल-धवल गिरि के शिखरों पर

प्रियवरतुम कब तक सोये थे?

रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदाससच-सच बतलाना!

यह हम लोगों ने पढ़ा था, ‘कालिदास सच-सच बतलाना’ कविता में, जो नागार्जुन की कविता है I यह बार-बार मेघदूत जो है, ये बड़ा HAUNT करता था I जो भी कवि ह्रदय है, थोड़ा सा बादलों को देखकर वह रूमानी होता है, इसमें कोई दो राय नहीं है I थोड़ा और बड़े हुए तो मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन‘ पढ़ा और ‘आषाढ़ का एक दिन‘ पढ़ने के बाद और फिर कालिदास के ‘मेघदूत’ को जब आप पढ़ते हैं, तो आप देखेंगे कि दोनों में क्या स्थिति कालिदास की खुद अपनी बनती है I मल्लिका की क्या स्थिति है और उसमें भी जिस तरह से अष्टावक्र का आना और कालिदास का कश्मीर तक जाते हुए और फिर लौटकर बादलों के स्मृति में लौट  जाना, अकेले हो जाना I पीड़ा जो मैंने एक छोटी सी बात शुरुआत में कही थी (नागार्जुन वाली) उसके पीछे यही था कि मैंने  उससे इसको जोड़ा था क्योंकि हमारे यहाँ एक कहावत है की जाके पाँव न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई ? घायल की गति घायल ही जानता है, तो जाके पाँव न फटी बिवाई, वह पीर नहीं जानता I  यह माना जाता है कि कालिदास ने यह जो रचना की, उस मेघदूत रचना के जो दो हिस्से थे एक यक्ष का विरह की अग्नि में जलना और दूसरा उसका मेघ द्वारा संदेश भेजना और उसमें  रास्तों का जिक्र है, मतलब कि बाबा रामदेव को लेकर कनखल तो बहुत लोग जानते हैं I हरिद्वार बहुत लोग जानते हैं I कनखल जानते हैं, लेकिन कनखल की जो पौराणिकता है, सती के अपमान, दक्ष के यज्ञ के विध्वंस किये जाने की घटना और सारे को समेकित करते हुए मेघदूत से भी कनखल का जिक्र करते हैं और जोड़ते हैं, कालिदास I जिस पर्वत पर जाकर यक्ष ने आश्रय लिया है और यक्ष अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था और इसीलिये वह स्वर्ण कमल लाने में जो प्रमाद हुआ, बिलम्ब हुआ और जिसके कारण कुबेर ने उसे अलकापुरी से निष्कासित कर दिया कि तुम इतना प्रेम में डूबे रहते हो कि तुम्हें एक दायित्व दिया गया और तुम प्रमाद कर बैठे, तुम्हें अलकापुरी से एक वर्ष के लिए निष्कासित किया जाता है और उसमें     भी वह बादलों को देखकर------- यह अच्छा है कि हम लोग 23 जून को कार्यक्रम कर रहे हैं और आषाढ़ पांच दिन पहले लग चुका है और वह आषाढ़ का पहला ही दिन था I पहले ही दिन की बात थी की मेघ को देखके प्रेयसी जो है कहीं वह विप्रलम्भ में परेशान न हो I इसलिए ---जो लोग पहाड़ में बरसात में गए हैं I पहाड़ में बादल जो बहुत ऊपर नहीं   , ऊपर तो ऐसे घिर जाता है I लेकिन कभी आप मैदान से जहां पहाड़ पर चढ़ते हुए जाते हैं, कम ऊँचाई पर जहां चीड़ हैं I देवदार नहीं, चीड़ हैं I उन चीड़ों के पेड़ों पर बारिश के बाद, खूब अगर बारिश हो रही हो तो उसके बाद आप दूर से देखिये कुछ किलोमीटर पहले तो लगता है  कुछ सफ़ेद सा घना सा बादलों सरीखा उस पर अटका पड़ा है I     

गोपाल नारायण जी, कभी मैं भी गीत लिखा करता था तो सावन पर हमारे यहाँ होस्टल में इलाहाबाद में ‘सावन गीत माला‘ I  तो ‘सावन गीत माला‘ में एक सावन गीत हमने भी लिखा तो उसमें     यही बिंदु पकड़ में आया था ‘मेघदूत’ वाला और वह यही था कि सावन की बरसात है और प्रीतम दूर है, उसको बुलाया जा रहा है कि ऐसे में तुम आ जाओ तो वहाँ तक संदेश भेजने का माध्यम चुनने का मौक़ा आया तो मुझे भी मेघदूत की याद आयी I    

तुम तक जो बादल भेजा था मैंने शायद

धानी चुनरी देख कहीं पर बरस गया है

या पछाड़ खाकर पहाड़ की घाटी में वो

चीड़ों की टहनी पर जाकर अटक गया है

ये जो बात थी उस समय वही मेघदूत, क्योंकि मेघदूत की रचना कालिदास की ऐसी इकलौती रचना है I ठीक है की कुमारसम्भव की चर्चा होती है I रघुवंश की चर्चा होती है I लेकिन मेघदूत को पढ़ना कालिदास की समूची प्रतिभा से गुजर जाना है और जब मेघदूत का अनुवाद डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी का यह मैंने देखा तो इसको पलटकर मैं गोपाल नारायण जी की पूरी आकृति मेरे ध्यान में आने लगी I मैं इनको ध्यान से देखने लगा कि कोई इतना धीर–गम्भीर कम बोलने वाला व्यक्ति इतनी रूमानी कविता का अनुवाद कर रहा हो, क्योंकि बहुत  रोमांटिक है I मेघदूत जिन्होंने पढ़ा होगा उन्हें मालूम होगा I यहाँ तक कि मंगलाचरण के बाद ही जिस तरह से वो गंगा का वर्णन है, वह फटी हुयी साड़ी के दृश्य हैं I कैलाश की गोद में गंगा के पड़े होने का संदर्भ है, वह सब I आप हतप्रभ रह जाते हैं और उस कठिन से उस पूरे श्लोक को आपने जितनी आसानी से और ख़ूबसूरती से रखा है, आपका मैं मुरीद बन गया हूँ I बहुत अच्छा अनुवाद आपने किया है I इसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है बल्कि आपके आने के पहले हम लोग चर्चा कर रहे थे कि गोपाल जी बहुत अच्छे गीत लिखते हैं I आपका जो बेनी माधव प्रकरण और ‘नौ लाख का टूटा हाथी’ इतिहास कथा-संग्रह था, उसको मैंने पढ़ा था वह बहुत अच्छा लिखा हुआ है I  हिन्दी और इतिहास, इन दोनों का अगर संस्कृत के साथ किसी का अध्ययन है तो वह मेघदूत को और अच्छा समझेगा और यह संयोग है कि आपकी संस्कृत हिन्दी और इतिहास तीनों अच्छे हैं, क्योंकि आपका विषय भी रायबरेली का पी-यच डी का रहा है, तो वो तीनों मिलाकर गोपाल नारायण जी ने बहुत ख़ूबसूरती से इसे किया है I एक चर्चा यह मिलती जरूर है कि मेघदूत में 115 पद है या111 की बात आती है I अब इसमें आपने जो नंबरिंग की है, वह नंबरिंग शायद उतनी नहीं है I प्रति मेघ इक्यावन या बावन तक है I तो उसकी क्या वजह है कैसे किया है यह तो आप जानते हैं I बाकी आपने अनुवाद बहुत सुन्दर किया है और इसमें आपके गीतकार की क्षमता का भी पता लगता है और यही हम लोग बात कर रहे थे कि अगर गोपाल नारायण जी को एक गीतकार गोपाल नारायण जी को अगर ख़तम करना आ जाता, बहुत अच्छे गीतकार हैं, यह मेरा अपना मानना है I क्योंकि आप जब लिखते हैं तो पाया गया है कि बहुत लंबा होता जाता है और वह इतना लंबा खिंच जाता है कि सौन्दर्य धीरे-धीरे कम होता जाता है I स्फीत उसमें बढ़ती जाती है और स्फीत कविता को हमेशा बाधित करती है I रोकती है I चाहे वह मुक्त छंद कविता हो गीत हो या छंद से जुडी हो I महत्वपूर्ण एक बात और है कि आपने दूत परम्परा की भी चर्चा की है और अभी आप जायसी पर किताब जब लिखे होंगे, तो हम सब जानते हैं कि जायसी का जो विरह वर्णन है – नागमती का विरह वर्णन,  तो वहाँ भी जायसी कहते हैं कि –

पिउ से कहेव संदेशड़ा,  हे भौंरा  ! हे काग !

सो धनि विरहै जरि मुई तेहिक धुवां हम लाग II    

भौंरा और कौए से वह संदेश भिजवाते हैं कि मैं उसी विरही के उस विरह में जलकर हम लोगों का रंग काला हो गया है I भौंरा और कौए का रंग काला नागमती के विरह में जलने से उठे  हुए धुएं के वजह से हुआ है और अपना रंग बताकर रत्नसेन को समझना कि वह कितने विरह में है I यह भी एक संदेश है I नल- दमयंती की कथा में भी यह संदर्भ आता है I हमारे यहाँ शुक-संवाद का जिक्र है I पद्मावत में खुद जो हीरामन है वह एक शुक है जो गुरु भी है और  संदेश का आदान- प्रदान करता है I तो हमारे यहाँ तो चिठ्ठी-पाती और पत्र की एक परम्परा रही है I विनय पत्रिका ही लिख मारी तुलसीदास ने I तो यह पूरा का पूरा आपने, जो भारतीय लोक परम्परा है और दूसरा जो भारतीय काव्य रुढियों की परम्परा है, उनको भी जोड़ा है और उसके साथ मेघदूत का हिन्दी में जो इतना खूबसूरत सा अनुवाद किया है, उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं I

 

 (मौलिक ,अप्रकाशित )

 

 

 

 

 

 

 

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