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बड़ा जग भरा नीर जूठा किया

मगर घूँट भर ही लिया औ पिया

उँडेला गया सब,बचा जो, उसे

जरूरत कहाँ है न मन में घुसे

खुले में जला फूँस करते धुआँ

रहे खोद खुद के लिए यूँ कुआँ

जहर से भरी वायु होगी जहाँ

भला ठीक साँसें मिलेंगी कहाँ

चलाएं पटाखे खुशी में सभी

न सोचें सही ये न होता कभी

करें शोर जो कान को फोड़ता

पटाखा हमेशा धुआँ छोड़ता

भरी गाड़ियों से दिखें सब सड़क

करें भूल हड्डी चलेगी मड़क

न जीवन बनें मुश्किलों से भरा

चलें सब सँभलकर तभी है खरा

न समझो कि बचपन बड़ी मौज है

लदा देख भारी बहुत बोझ है

किताबें सदा घेरती हैं इसे

सुझाए भला बात यह वो किसे

पढ़ें और खेलें बढ़ेंगे तभी

रहें स्वस्थ तो काम कर लें सभी

न समझें किताबें बड़ा भार हैं

समेटे हुए एक संसार हैं

मौलिक अप्रकाशित

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Replies to This Discussion

आद0 सतविंदर भाई जी सादर अभिवादन। बेहतरीन बाल कविताएं पढ़ने को मिली। एक दो जगह तुकांतता देख लीजिए। शेष उत्तम। बहुत बहुत बधाई आपको। सादर

बढ़िया कविताएं।‌ हार्दिक बधाई आदरणीय सतविंदर कुमार राणा साहिब 

जीवन शैली में हमारी छोटी-बड़ी  ग़लतियों पर बेहतरीन विचारोत्तेजक, प्रेरक और प्रोत्साहक सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और आभार आदरणीय  सतविन्द्र कुमार राणा साहिब।

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