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61. फल


मेहनत का मिलता है फल,
कोशिश होती सदा सफल।
काम आज का आज करो,
किसने देखा बोलो कल?

*
62. नदी 


 

नदी न रुकती, बहती है,
हर मौसम चुप सहती है।
पानी मत गंदा करना-
सुनो तुम्हीं से कहती है।।
*
63. तालाब


 

सभी का मन लुभाता है,
भरा तालाब में पानी।
कमल के फूल मन मोहें-
न पाटो, है ये नादानी।।
*
64. झरना



धीरे-धीरे आता है,
फिर यह चाल बढ़ाता है।
कूद शिखर से गड्ढे में-
हँसता है, मस्ताता है।
*
65. सागर
 


सारी दुनिया की गागर,
यह विशाल नीला सागर।
किसने रंग दिया नीला?
यह लहरों का जलसा घर?

*
66. मछली 



मछली पानी में भाती,
हाथ लगाओ डर जाती।
पानी को करती है साफ़-
बाहर निकले मर जाती।
*
67. बंदर
 


बंदर खेल दिखाता है,
सबको खूब रिझाता है।
दिख जाए फल अगर इसे-
खाने को ललचाता है।।
*
68. बंदरिया
 


पहने लाल घघरिया है,
नाची खूब बंदरिया है।
बच्चे बजा रहे ताली-
बंदर बना सँवरिया है।।
*
69. मुर्गा
 


सूरज जब उग आता है,
मुर्गा झट जग जाता है।
प्यारे बच्चों जग जाओ-
जमकर बांग लगता है।।
*
70. तितली


बगिया में जब खिली कली,
झूम-नाच खेले तितली।
भँवरे चाचा थाम रहे-
सम्हली, फिसली फिर सम्हली।।
*

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श्रेणीबद्ध पारिभाषिक प्रस्तुतियों के लिए सादर अभिनन्दन, आचार्यवर. ऐसी छोटी चौपदियाँ गेय होने के कारण अक्सर बच्चों की ज़ुबां पर चढ जाती हैं. अब यह उन माता-पिताओं और अभिभावकों के ऊपर निर्भर है कि क्या वे इन रोचक रचनाओं को अपने बच्चों के लिए उपलब्ध कराते भी हैं !

विशेष, यह अवश्य कहूँगा कि कुछ चौपदियों के आयाम थोड़े और व्यावहारिक या स्पष्ट होते. फिर भी एक विशिष्ट कार्य हेतु बधाई.

आदरणीय संजीव जी,

आस पास के वातावरण के अवयवों पर जीव जंतुओं पर सुन्दर पंक्तिया लिखीं है. हार्दिक बधाई .

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